Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और रक्षा के संकल्प का पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जब बहन किसी कारण से राखी बांधने नहीं पहुंच पाती और वह राखी पहले ही भेज देती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्नी अपने पति की कलाई पर बहन की भेजी हुई राखी बांध सकती है?
आचार्य मदनमोहन के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन पत्नी का पति को राखी बांधना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता है। उनका कहना है कि राखी बांधने की परंपरा मुख्य रूप से भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़ी हुई है। इसलिए पत्नी को पति की कलाई पर राखी बांधने से बचना चाहिए।

पत्नी को पति को राखी बांधने से क्यों मना किया जाता है?
आचार्य के मुताबिक रक्षाबंधन में बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है। यह भाई-बहन के रिश्ते और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। पति-पत्नी का रिश्ता अलग प्रकृति का होता है, इसलिए पत्नी द्वारा पति को राखी बांधने की परंपरा धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं मानी जाती।
क्या पति-पत्नी के रिश्ते पर पड़ता है कोई प्रभाव?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पत्नी द्वारा पति को राखी बांधने को शुभ नहीं माना जाता और इससे दांपत्य जीवन में तनाव या मतभेद होने की आशंका बताई जाती है। हालांकि, ऐसी मान्यताओं को आस्था और परंपरा के नजरिए से ही देखना चाहिए। इनके वैज्ञानिक प्रभाव का कोई प्रमाण नहीं है।
बहन की राखी आ गई हो तो क्या करें?
अगर बहन किसी वजह से रक्षाबंधन पर भाई के पास नहीं पहुंच पाती और अपनी राखी भेज देती है, तो पत्नी से राखी बंधवाने के बजाय भाई खुद बहन की भेजी हुई राखी धारण कर सकता है। इसके अलावा परिवार में मौजूद किसी अन्य बहन से भी राखी बंधवाई जा सकती है। आचार्य ने परिवार की चाचा या ताऊ की बेटी अथवा मौसी की बेटी से राखी बंधवाने का विकल्प भी बताया है।
क्या पत्नी पति को रक्षा सूत्र बांध सकती है?
आचार्य मदनमोहन के अनुसार, पत्नी को पति की कलाई पर रक्षासूत्र बांधने से भी बचना चाहिए। उनके मुताबिक रक्षासूत्र बांधने की परंपरा में भी बहन और भाई के रिश्ते को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए पत्नी की जगह बहन या परिवार की किसी अन्य योग्य महिला रिश्तेदार से रक्षा सूत्र बंधवाना उचित माना जाता है।
नोट: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और आचार्य द्वारा बताए गए विचारों पर आधारित है। अलग-अलग परंपराओं और विद्वानों की मान्यताएं अलग हो सकती हैं।







