नई दिल्ली। India Artificial Sunभारत न्यूक्लियर फ्यूजन एनर्जी के क्षेत्र में लगातार अपनी तकनीकी क्षमता मजबूत कर रहा है। गुजरात स्थित प्लाज्मा रिसर्च इंस्टीट्यूट के SST-1 टोकामक पर एक नए शक्तिशाली जाइरोट्रॉन को सफलतापूर्वक चालू किया गया है। 82.6 गीगाहर्ट्ज फ्रिक्वेंसी और 400 किलोवाट क्षमता वाला यह सिस्टम बेहद गर्म प्लाज्मा को गर्म करने में वैज्ञानिकों की मदद करेगा।
SST-1 भारत का सुपरकंडक्टिंग टोकामक है, जिसे फ्यूजन की उस प्रक्रिया को समझने और नियंत्रित करने के लिए विकसित किया गया है, जो सूर्य और दूसरे तारों में ऊर्जा पैदा करती है। इस प्रयोग में चुंबकीय क्षेत्रों की मदद से अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित किया जाता है। भारतीय फ्यूजन प्रयोगों में प्लाज्मा का तापमान 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी अधिक पहुंच चुका है। यह तापमान सूर्य के केंद्र के तापमान से कई गुना ज्यादा है।

नया जाइरोट्रॉन क्यों है खास?
जाइरोट्रॉन एक विशेष उपकरण है, जो बेहद उच्च फ्रिक्वेंसी वाली माइक्रोवेव ऊर्जा पैदा करता है। इस ऊर्जा को टोकामक के अंदर मौजूद प्लाज्मा में पहुंचाया जाता है, जिससे उसका तापमान बढ़ाने में मदद मिलती है।
SST-1 पर पहले 42 गीगाहर्ट्ज वाला सिस्टम इस्तेमाल किया जा रहा था। अब 82.6 गीगाहर्ट्ज का नया जाइरोट्रॉन ज्यादा प्रभावी प्लाज्मा हीटिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे वैज्ञानिकों को उच्च तापमान वाले प्लाज्मा पर और बेहतर प्रयोग करने का अवसर मिलेगा।
फ्यूजन तकनीक में केवल बेहद ज्यादा तापमान हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती इस गर्म प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर और नियंत्रित रखना है। नया सिस्टम इसी दिशा में अनुसंधान को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
सूर्य से भी ज्यादा गर्म क्यों किया जाता है प्लाज्मा?
फ्यूजन रिएक्टर में पृथ्वी पर सूर्य के केंद्र से भी ज्यादा तापमान की जरूरत पड़ती है। इसका कारण पृथ्वी पर सूर्य जैसा अत्यधिक दबाव मौजूद नहीं होना है। सूर्य के भीतर बेहद ज्यादा गुरुत्वाकर्षण दबाव के कारण फ्यूजन अपेक्षाकृत कम तापमान पर भी संभव होता है, जबकि टोकामक में उस स्थिति को अलग तरीके से हासिल करना पड़ता है।
SST-1 में प्लाज्मा को मजबूत चुंबकीय क्षेत्रों के जरिए नियंत्रित किया जाता है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसी परिस्थितियां तैयार करना है, जहां हल्के परमाणु नाभिक आपस में जुड़कर भारी नाभिक बनाएं और इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऊर्जा रिलीज हो।
फ्यूजन एनर्जी को भविष्य की ऊर्जा क्यों कहा जाता है?
न्यूक्लियर फ्यूजन को भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के प्रमुख विकल्पों में गिना जाता है। इसमें हाइड्रोजन के आइसोटोप का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जा सकता है। फ्यूजन प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन बेहद कम होता है और पारंपरिक फिशन आधारित परमाणु ऊर्जा की तुलना में लंबे समय तक रहने वाले रेडियोधर्मी कचरे की समस्या अलग और अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
हालांकि, फ्यूजन से व्यावसायिक स्तर पर बिजली बनाना अभी भी बेहद कठिन इंजीनियरिंग चुनौती है। SST-1 फिलहाल बिजली बनाने वाला व्यावसायिक रिएक्टर नहीं है, बल्कि यह फ्यूजन तकनीक पर अनुसंधान के लिए बनाया गया प्रयोगात्मक सिस्टम है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?
नए जाइरोट्रॉन की मदद से भारतीय वैज्ञानिक प्लाज्मा को गर्म करने और उसके व्यवहार को समझने से जुड़े ज्यादा उन्नत प्रयोग कर सकेंगे। इससे भविष्य में बड़े और ज्यादा शक्तिशाली फ्यूजन रिएक्टरों के विकास के लिए जरूरी तकनीकी अनुभव हासिल करने में मदद मिल सकती है।
भारत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय फ्यूजन रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। SST-1 जैसे प्रयोगों से प्राप्त अनुभव देश की स्वदेशी फ्यूजन तकनीक को मजबूत कर सकता है और भविष्य में बड़े फ्यूजन प्रोजेक्ट्स के लिए आधार तैयार कर सकता है।
अभी क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
फ्यूजन ऊर्जा को व्यावसायिक रूप से हासिल करने की राह अभी लंबी है। वैज्ञानिकों के सामने प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर रखने, अत्यधिक तापमान को नियंत्रित करने, रिएक्टर की सामग्री को सुरक्षित रखने और लगातार ऊर्जा उत्पादन जैसी कई चुनौतियां हैं।
फिर भी 82.6 गीगाहर्ट्ज जाइरोट्रॉन की उपलब्धता भारत के फ्यूजन अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे वैज्ञानिकों को ज्यादा उन्नत प्रयोग करने का मौका मिलेगा और देश के ‘कृत्रिम सूरज’ जैसे फ्यूजन अनुसंधान कार्यक्रम को नई ताकत मिल सकती है।
कुल मिलाकर, भारत का फ्यूजन अनुसंधान धीरे-धीरे उस लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, जिसमें सूर्य जैसी परमाणु संलयन प्रक्रिया को पृथ्वी पर नियंत्रित करके स्वच्छ ऊर्जा हासिल की जा सके। हालांकि व्यावसायिक फ्यूजन बिजली अभी भविष्य की बात है, लेकिन SST-1 और नए जाइरोट्रॉन जैसी तकनीकी उपलब्धियां इस दिशा में भारत की क्षमता को लगातार मजबूत कर रही हैं।







