El Nino Alert: अल नीनो को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ने लगी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का EOS-06 सैटेलाइट प्रशांत महासागर में हो रहे समुद्री और वायुमंडलीय बदलावों पर नजर रख रहा है। सैटेलाइट से मिले आंकड़ों में ऐसे संकेत सामने आए हैं, जिन्हें मजबूत होते अल नीनो की शुरुआत से जोड़कर देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले महीनों में इसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।
पृथ्वी से करीब 741 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद EOS-06 भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में होने वाले बदलावों को लगातार रिकॉर्ड कर रहा है। खास तौर पर समुद्र में क्लोरोफिल की मात्रा में गिरावट और हवाओं के पैटर्न में बदलाव ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई है।


ISRO सैटेलाइट ने पकड़े अल नीनो के शुरुआती संकेत

ISRO के EOS-06 से प्राप्त आंकड़े विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमानों से भी मेल खाते हैं। जून 2026 में WMO ने जून से अगस्त के दौरान अल नीनो बनने की संभावना करीब 80 प्रतिशत बताई थी। इसके बाद कई मौसम मॉडल भी मजबूत अल नीनो की ओर संकेत कर रहे थे।
जुलाई के अंत तक WMO ने बताया कि अल नीनो की स्थिति तेजी से मजबूत हो रही है और अगस्त से अक्टूबर 2026 के बीच इसके और ताकतवर होने की उम्मीद है।
प्रशांत महासागर में क्लोरोफिल की कमी ने बढ़ाई चिंता

EOS-06 के आंकड़ों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में क्लोरोफिल-ए की मात्रा में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। क्लोरोफिल-ए फाइटोप्लांकटन में पाया जाता है। समुद्र में मौजूद ये सूक्ष्म जीव समुद्री खाद्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं।
हैदराबाद स्थित ISRO के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के अनुसार, जून 2026 में ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में सतह पर क्लोरोफिल-ए की मात्रा में बड़ी कमी देखी गई। इसकी तुलना 2024 और 2025 की समान अवधि से भी की गई, जब ENSO की स्थिति काफी हद तक सामान्य थी।
हवाओं का बदला पैटर्न भी दे रहा संकेत
सैटेलाइट ने समुद्र की सतह पर चलने वाली हवाओं के पैटर्न में भी बदलाव दर्ज किया है। हवाओं का ईस्टरलीज से वेस्टरलीज की ओर बदलाव अल नीनो के विकास से जुड़ा प्रमुख संकेत माना जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र में क्लोरोफिल की मात्रा में बदलाव कई बार समुद्र की सतह के तापमान में होने वाले बदलाव से पहले दिखाई दे सकता है। ऐसे में सैटेलाइट से मिलने वाला यह डेटा अल नीनो की शुरुआती स्थिति पर नजर रखने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
कैसे काम करता है ISRO का अर्ली वार्निंग सिस्टम?

ISRO के NRSC के निदेशक डॉ. प्रकाश चौहान के अनुसार, पूर्वी प्रशांत महासागर में गर्म पानी बढ़ने से समुद्र की गहरी परतों से ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर पानी के ऊपर आने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसका असर फाइटोप्लांकटन की वृद्धि पर भी पड़ता है।
EOS-06 में लगा ओशन कलर मॉनिटर समुद्र में होने वाले इन जैविक बदलावों को रिकॉर्ड करता है। वहीं सैटेलाइट में मौजूद स्कैटरोमीटर समुद्री हवाओं की दिशा और उनकी गति से जुड़े बदलावों पर नजर रखता है।
दोनों उपकरणों से मिलने वाले आंकड़ों को मिलाकर वैज्ञानिक प्रशांत महासागर में अल नीनो की शुरुआत और उसके विकास को समझने की कोशिश करते हैं।
क्या है अल नीनो और क्यों है भारत के लिए अहम?
अल नीनो, ENSO यानी El Niño-Southern Oscillation का गर्म चरण है। यह दुनिया के प्रमुख मौसम तंत्रों में से एक है। सामान्य स्थिति में व्यापारिक हवाएं प्रशांत महासागर के गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। इससे दक्षिण अमेरिका के तट के पास ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आता है।
अल नीनो के दौरान व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं या उनके पैटर्न में बदलाव हो सकता है। इससे प्रशांत महासागर का गर्म पानी पूर्व की ओर फैलता है और समुद्र की गहराई से ठंडे पानी के ऊपर आने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है। कई क्षेत्रों में बारिश, सूखा, बाढ़ और तापमान के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए अल नीनो खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका संबंध अक्सर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की कमजोर बारिश से जोड़ा जाता है। हालांकि हर अल नीनो की स्थिति में सूखा पड़े, यह जरूरी नहीं है, लेकिन मजबूत अल नीनो की स्थिति में कम बारिश, मिट्टी की नमी में कमी, कृषि पर दबाव और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
EOS-06 की तकनीक क्यों है खास?
EOS-06 को 22 नवंबर 2022 को PSLV के जरिए लॉन्च किया गया था। इसमें ओशन कलर मॉनिटर-3 और स्कैटरोमीटर जैसे उपकरण लगाए गए हैं।
ये उपकरण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, समुद्री हवाओं और समुद्र-वायुमंडल के बीच होने वाले बदलावों की निगरानी करते हैं। क्लोरोफिल और हवाओं से जुड़े आंकड़ों को एक साथ देखकर वैज्ञानिक प्रशांत महासागर में हो रहे बदलावों को लगभग रियल टाइम में समझ सकते हैं।
अगर अल नीनो से जुड़े मौजूदा अनुमान सही साबित होते हैं और इसकी स्थिति आगे और मजबूत होती है, तो आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर में इसके प्रभाव और स्पष्ट दिखाई दे सकते हैं।






