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उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में दिखे जंगली कुत्तों ( ढोल ) के झुंड, पारिस्थितिकी पुनरुद्धार का मिला सकारात्मक संकेत

By NS
On: June 27, 2026 12:33 PM
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गरियाबंद। अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) 2026 के अंतर्गत उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) में लगाए गए कैमरा ट्रैपों में *चार ढोल (भारतीय जंगली कुत्तों) के एक झुंड की तस्वीरें एवं वीडियो रिकॉर्ड किए गए हैं। एक संगठित ढोल झुंड का इस प्रकार दर्ज होना रिजर्व की पारिस्थितिकीय स्थिति में सुधार तथा विगत वर्षों में किए गए प्रभावी संरक्षण एवं आवास पुनर्स्थापना प्रयासों का महत्वपूर्ण संकेत है।

ढोल (Cuon alpinus) भारत के सबसे आकर्षक एवं दुर्लभ मांसाहारी वन्यजीवों में से एक हैं। यह प्रजाति आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में “संकटग्रस्त (Endangered)” श्रेणी में सूचीबद्ध है तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के अंतर्गत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। ये अत्यंत सामाजिक प्राणी हैं, जो संगठित झुंड में रहते और सामूहिक रूप से शिकार करते हैं।

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ढोल वन पारिस्थितिकी तंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे चीतल, सांभर एवं जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों की आबादी को संतुलित बनाए रखते हैं, जिससे वनस्पतियों एवं प्राकृतिक पुनर्जनन को संरक्षण मिलता है। अपनी अद्भुत सामूहिक रणनीति, समन्वय और सहकारिता के कारण ढोल विश्व के सबसे कुशल समूह-शिकारी माने जाते हैं। बड़े एवं संगठित झुंड में वे बाघ जैसे बड़े परभक्षियों को चुनौती देने तथा दुर्लभ परिस्थितियों में उनका शिकार करने की क्षमता भी रखते हैं।

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में ढोल के इस झुंड का रिकॉर्ड होना रिजर्व प्रशासन द्वारा पिछले कुछ वर्षों में चलाए गए सघन संरक्षण एवं प्रबंधन प्रयासों का प्रत्यक्ष परिणाम है। इन प्रयासों में प्रमुख रूप से शामिल हैं-

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लगभग 956 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कर उसका पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन*, जिससे वन्यजीवों के महत्वपूर्ण आवास एवं आवागमन गलियारों की पुनर्बहाली हुई है।
550 से अधिक वन्यजीव अपराधियों, शिकारियों एवं तस्करों की गिरफ्तारी, जिससे वन्यजीव संरक्षण एवं कानून प्रवर्तन को अभूतपूर्व मजबूती मिली है।
सघन एंटी-पोचिंग अभियान*, नियमित गश्त, कैमरा ट्रैप आधारित निगरानी, खुफिया सूचनाओं पर आधारित कार्रवाई तथा स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी।
वन आवासों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए निरंतर प्रयास, जिनसे रिजर्व की जैव-विविधता और पारिस्थितिकीय अखंडता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

AITE 2026 के दौरान चार ढोलों का रिकॉर्ड होना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में किए जा रहे संरक्षण प्रयास धरातल पर सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं। ढोल जैसे संवेदनशील एवं संकटग्रस्त मांसाहारी जीवों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि रिजर्व का खाद्य-श्रृंखला तंत्र, शिकार आधार और वन आवास निरंतर सुदृढ़ हो रहे हैं तथा उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व मध्य भारत में वन्यजीव संरक्षण के एक उभरते हुए सुरक्षित परिदृश्य के रूप में स्थापित हो रहा है।

“किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता केवल बाघों की उपस्थिति से नहीं, बल्कि संपूर्ण खाद्य-श्रृंखला और जैव-विविधता के स्वास्थ्य से मापी जाती है। ढोल जैसे संकटग्रस्त मांसाहारी जीवों का एक संगठित झुंड उदंती-सीतानदी के वनों की बढ़ती पारिस्थितिकीय सुदृढ़ता और संरक्षण प्रयासों की सफलता का सशक्त प्रमाण है।”



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