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अग्नि मिसाइल से ‘दृष्टि’ सिस्टम तक… जानिए भारत की ‘सेफ

By NS
On: August 3, 2026 7:36 PM
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नई दिल्ली। Dr Shubha Venkatesh Iyengar:भारत आज रक्षा और विमानन तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है। अग्नि जैसी अत्याधुनिक मिसाइलों से लेकर एयरपोर्ट पर विमानों की सुरक्षित लैंडिंग तक, कई स्वदेशी तकनीकों के पीछे भारतीय वैज्ञानिकों का अहम योगदान है। इन्हीं में एक नाम है पद्मश्री डॉ. शुभा वेंकटेश अय्यंगार का, जिन्हें भारत की ‘सेफ फ्लाइट वूमन’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने न सिर्फ अग्नि मिसाइल को तकनीकी रूप से और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई, बल्कि देश का पहला स्वदेशी ‘दृष्टि’ रनवे विजिबिलिटी सिस्टम भी विकसित किया।

कर्नाटक में जन्मीं डॉ. शुभा वेंकटेश अय्यंगार अपने परिवार में नौ भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उस समय लड़कियों की उच्च शिक्षा को लेकर समाज में कई बाधाएं थीं, लेकिन उनके पिता ने उनकी पढ़ाई का पूरा समर्थन किया। बचपन से ही उन्हें भौतिकी (फिजिक्स) में गहरी रुचि थी। उन्होंने बेंगलुरु यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

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साल 1974 में उन्होंने बेंगलुरु स्थित CSIR-नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेट्री (CSIR-NAL) में रिसर्च स्टूडेंट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। यहां उन्होंने मटेरियल साइंस और एयरपोर्ट इंस्ट्रूमेंट डिवीजन में काम करते हुए 46 वर्षों तक देश की रक्षा और विमानन तकनीक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में योगदान दिया।

डॉ. शुभा और उनकी टीम ने भारत का पहला स्वदेशी ‘दृष्टि’ रनवे विजिबिलिटी सिस्टम विकसित किया, जो घने कोहरे में भी विमानों की सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करता है। यह तकनीक केवल तीन महीने में तैयार की गई थी। इसकी मदद से पायलटों को मौसम और दृश्यता की सटीक जानकारी मिलती है। आज यह सिस्टम देश के 171 एयरपोर्ट पर इस्तेमाल हो रहा है। पूरी तरह स्वदेशी होने के कारण इसने सरकार के करोड़ों रुपये भी बचाए हैं।

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रक्षा क्षेत्र में भी डॉ. शुभा का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अग्नि मिसाइल के विकास के दौरान एक जटिल तकनीकी समस्या का समाधान किया, जिससे मिसाइल की सटीकता और क्षमता में सुधार हुआ। इसके अलावा उन्होंने रैमजेट और स्क्रैमजेट इंजनों के लिए ऐसे स्वदेशी पुर्जे विकसित किए, जो 3000 केल्विन (करीब 2726 डिग्री सेल्सियस) तक के तापमान और मैक 5 यानी ध्वनि की गति से पांच गुना अधिक रफ्तार को भी सहन कर सकते हैं।

उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। डॉ. शुभा के तीन शोध पत्र नासा की आधिकारिक रिपोर्टों में प्रकाशित किए गए। अपने 46 साल के करियर में उन्हें 43 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।



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