
लोकतंत्र की हत्या की फिर एक खबर है और यह खबर गुजरात से है। गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में 730 से अधिक उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए। इनमें से अधिकांश भाजपा के हैं।
गुजरात राज्य चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 15 नगर निगमों, 84 नगर पालिकाओं, 34 जिला पंचायतों और 260 तालुका पंचायतों में हुए चुनावों में 1572 प्रत्याशियों ने नामांकन के बाद नाम वापस ले लिए थे।निर्विरोध निर्वाचित होने वालों की संख्या 2021 में 220 थी और 2015 में मात्र 37। दिलचस्प है।
पहले लोग चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल करते हैं फिर नामांकन वापस ले लेते हैं !लेकिन खबर इतनी ही नहीं है। इसके बाद जो हुआ वो इस देश के लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक था।इन नतीजों के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि उद्देश्य ऐसी स्थिति बनाना हो जहां सत्तारूढ़ दल के खिलाफ कोई नामांकन ही न दाखिल न करे।चुनाव अभियान के दौरान आनंद से भाजपा सांसद मितेश पटेल की वो धमकी अभी ताजा ही थी जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर उनके क्षेत्र में कांग्रेस ने एक सीट भी जीती तो विकास के लिए एक रुपया भी नहीं मिलेगा।
अब मुख्यमंत्री का यह बयान है। इस चुनाव में विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने बड़े पैमाने पर दबाव, प्रलोभन और धमकी के आरोप लगाए हैं। क्या गुजरात बिना चुनावों के सत्ता हथियाने की प्रयोगशाला बन रहा है ?
क्या गुजरात का यह उदाहरण इस देश से विपक्ष के अस्तित्व को समाप्त कर देने की एक विचारधारा की आकांक्षा का उदाहरण है ?क्या लोकतंत्र पर बुलडोजर ही चलेगा?क्या ये लोकतंत्र की हत्या का बड़ा उदाहरण नहीं है ?यह घटना भारत की बहुदलीय व्यवस्था पर गहरा रहे संकट का उदाहरण है। बहुदलीय प्रणाली में छोटे-छोटे दल और विपक्षी आवाजें लोकतंत्र को जिंदा रखती हैं।
इस देश की खूबी यही है कि यह विविध दृष्टिकोण को पूरी स्वतंत्रता के साथ स्पेस देता है। यह गुलामी के खिलाफ एक बेमिसाल संघर्ष से हासिल लोकतांत्रिक अधिकार है।यह अधिकार देश के उस संविधान से हासिल है जो भारत के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय ;विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रत देता है।
क्या गुजरात के स्थानीय निकाय के चुनाव में इन मूल्यों को जमींदोज कर दिया गया ? गुजरात के इन चुनावों के नतीजों और उसके बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की प्रतिक्रिया गंभीर सवालों को जन्म देती है। क्या भारतीय जनता पार्टी लोकतंत्र का दमन कर इस तरह सत्ता हथियाने के किसी दीर्घावधि प्रोजेक्ट पर काम कर रही है ?
गुजरात का यह उदाहरण कितनी बेशर्मी से भरा हुआ है! सांसद कहता है कांग्रेस की एक भी सीट आई तो विकास नहीं होने दूंगा और मुख्यमंत्री का बयान तो इससे भी आगे बढ़ कर था। गुजरात में भाजपा की मजबूत स्थिति किसी से छिपी नहीं है। फिर भी 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 50 प्रतिशत से भी कम वोट मिले थे। इसका अर्थ है कि जनमत पूर्ण रूप से एक तरफा नहीं है।
फिर भी स्थानीय स्तर पर इतनी व्यापक निर्विरोध जीत के क्या मायने हैं यह विमर्श और चिंता का विषय है। ऐसे निर्विरोध चुनाव मतदाता को इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सादरी से दूर करते हैं। गुजरात की यह घटना पूरे देश के लिए सबक है। अगर स्थानीय स्तर पर भी चुनाव बिना चुनौती के हो जाते हैं, तो लोकतंत्र की जड़ें ही कमजोर नहीं होतीं बल्कि यह रास्ता भी दिखाती हैं कि ऐसा विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में भी हो सकता है।
लोकतंत्र जनादेश से ही सुरक्षित रह सकेगा।जनता को दूर रखने की ऐसी साजिशें लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करेंगी।गुजरात का यह उदाहरण विपक्ष के लिए भी सबक है। विपक्ष को भी अपना घर मजबूत रखने की रणनीति पर मेहनत करनी चाहिए।
विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस को अपने संगठन और अपने कैडर को ऐसी परिस्थितियों का मुकाबला करने के लायक बनाना चाहिए।वरना ऐसे हमले होते रहेंगे और अंततः जो घायल होगा वो लोकतंत्र ही होगा।


