नई दिल्ली। India Politics: देशभर में लंबे समय से चर्चा का विषय बने ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation One Election) को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है, लेकिन इस दौरान सरकार की ओर से इस महत्वाकांक्षी योजना से जुड़ा विधेयक पेश किए जाने की संभावना लगभग खत्म होती नजर आ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) अभी अपनी रिपोर्ट तैयार नहीं कर पाई है।
जेपीसी के अध्यक्ष और भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने स्पष्ट कहा है कि समिति का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में मानसून सत्र से पहले रिपोर्ट सरकार को सौंपना संभव नहीं होगा। उन्होंने बताया कि समिति सरकार से अपने कार्यकाल को आगे बढ़ाने का अनुरोध करेगी ताकि सभी पहलुओं का गहन अध्ययन करने के बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार की जा सके।

अभी क्यों नहीं तैयार हुई रिपोर्ट?
पीपी चौधरी के अनुसार, समिति अब तक केवल 10 राज्यों का ही दौरा कर सकी है। जबकि देश के कई अन्य राज्यों में जाकर वहां की सरकारों, राजनीतिक दलों, विधानसभा अध्यक्षों, उपाध्यक्षों, विपक्ष के नेताओं और अन्य संबंधित पक्षों से चर्चा अभी बाकी है। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों की राय भी ली जानी है।
उन्होंने कहा कि इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता। समिति चाहती है कि सभी पक्षों की राय लेने के बाद ही सरकार को विस्तृत और संतुलित रिपोर्ट सौंपी जाए।
कई विशेषज्ञों से भी हो चुकी है चर्चा
जेपीसी अब तक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, लॉ कमीशन के अध्यक्ष, संवैधानिक विशेषज्ञों, चुनावी मामलों के जानकारों, अर्थशास्त्रियों और पद्म पुरस्कार से सम्मानित कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों से भी विचार-विमर्श कर चुकी है। समिति का उद्देश्य है कि रिपोर्ट पूरी तरह तथ्यात्मक और व्यापक हो, ताकि भविष्य में किसी तरह की संवैधानिक या कानूनी चुनौती का सामना न करना पड़े।
मानसून सत्र में नहीं आएगा विधेयक
चूंकि ‘एक देश, एक चुनाव’ और परिसीमन (Delimitation) दोनों ही संविधान संशोधन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक हैं, इसलिए इनके लिए पहले जेपीसी की रिपोर्ट आवश्यक मानी जा रही है। रिपोर्ट नहीं आने की स्थिति में इन विधेयकों के मानसून सत्र में पेश होने की संभावना बेहद कम हो गई है।
क्यों आसान नहीं है कानून बनाना?
संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा में एनडीए की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है, लेकिन लोकसभा में अभी भी सरकार को पर्याप्त समर्थन जुटाने की चुनौती बनी हुई है।
यदि विपक्ष के कुछ दल समर्थन भी देते हैं, तब भी आवश्यक संख्या तक पहुंचना आसान नहीं माना जा रहा है। यही वजह है कि सरकार इस मुद्दे पर पूरी तैयारी और व्यापक सहमति के साथ आगे बढ़ना चाहती है।
कब तक बढ़ सकता है समिति का कार्यकाल?
फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति का कार्यकाल 14 अगस्त तक निर्धारित है, लेकिन जेपीसी अध्यक्ष के बयान से साफ संकेत मिल रहे हैं कि सरकार इसे आगे भी बढ़ा सकती है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट तैयार करने में अभी कई महीने और लग सकते हैं।
कब लागू हो सकता है ‘एक देश, एक चुनाव’?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि जेपीसी समय पर रिपोर्ट सौंप भी देती है, तब भी कानून बनाने, संसद से पारित कराने, राज्यों की मंजूरी, चुनाव आयोग की तैयारी और ईवीएम की उपलब्धता जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। ऐसे में 2034 के आम चुनाव से पहले ‘एक देश, एक चुनाव’ व्यवस्था लागू होने की संभावना काफी कम मानी जा रही है।
सरकार को क्या होगा फायदा?
सरकारी आकलन के मुताबिक यदि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाते हैं तो करीब 7 लाख करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। इसके अलावा बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्यों में आने वाली बाधाएं भी कम होंगी और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
हालांकि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए लगभग 62 लाख नए ईवीएम खरीदने की आवश्यकता होगी, जिसके लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय और तकनीकी तैयारी करनी पड़ेगी।
समिति में कौन-कौन हैं शामिल?
‘एक देश, एक चुनाव’ पर गठित संयुक्त संसदीय समिति में कुल 39 सदस्य शामिल हैं। इनमें 27 सदस्य लोकसभा और 12 सदस्य राज्यसभा से हैं। समिति में प्रियंका गांधी, मनीष तिवारी, अनुराग ठाकुर, बांसुरी स्वराज, सुप्रिया सुले, धर्मेंद्र यादव और कल्याण बनर्जी जैसे कई प्रमुख सांसद शामिल हैं।
अब सभी की नजर मानसून सत्र और जेपीसी की अगली बैठक पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट आने के बाद ही सरकार इस महत्वाकांक्षी चुनाव सुधार योजना पर आगे की रणनीति तय करेगी।






