नई दिल्ली। India Weather Alert: भारत में आने वाले महीनों के मौसम को लेकर 180 से अधिक पर्यावरण और मौसम वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2026-27 में शक्तिशाली अल-नीनो की स्थिति बन सकती है, जिसका असर देश के मौसम, बारिश, तापमान, खेती, जंगल, वन्यजीव और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने सरकार, शोध संस्थानों और फंडिंग एजेंसियों से अभी से निगरानी और तैयारी बढ़ाने की अपील की है।
वैज्ञानिकों की ओर से जारी अध्ययन में कहा गया है कि आने वाला अल-नीनो सामान्य वर्षों की तुलना में अधिक प्रभावशाली हो सकता है। इसके कारण भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्मी और कम बारिश की स्थिति बन सकती है। हालांकि हर अल-नीनो का असर एक जैसा नहीं होता, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए आने वाले महीनों पर विशेष नजर रखने की जरूरत बताई गई है।


क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल-नीनो को अक्सर कमजोर या देर से आने वाले मानसून और अधिक गर्मी से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इसका प्रभाव हर बार अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
गर्मी और सूखे का बढ़ सकता है खतरा
वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि नवंबर 2026 से अगले साल तक भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्म और सूखा मौसम देखने को मिल सकता है। बारिश में कमी आने पर पानी के संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है और इसका असर खेती, पशुपालन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
जिन इलाकों में पहले से पानी की कमी है, वहां स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है। लंबे समय तक चलने वाली गर्मी का असर शहरों में भी दिखाई दे सकता है। कंक्रीट और सड़कों के कारण शहरी क्षेत्रों में तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक रहने की स्थिति में गर्मी का प्रभाव और बढ़ सकता है।
जंगलों में आग और वन्यजीवों पर असर

कम बारिश और बढ़ते तापमान के कारण जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ सकता है। सूखे जंगलों में आग तेजी से फैल सकती है, जिससे पेड़-पौधों के साथ पक्षियों और अन्य वन्यजीवों को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
मौसम में बदलाव से वन्यजीवों के भोजन, प्रजनन चक्र और उनके रहने के स्थान भी प्रभावित हो सकते हैं। इससे अलग-अलग प्रजातियों के बीच प्राकृतिक संतुलन पर असर पड़ने की संभावना जताई गई है।
समुद्र का तापमान बढ़ने से बढ़ सकती है परेशानी
अल-नीनो का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहता। समुद्री क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से मरीन हीटवेव यानी समुद्री गर्मी की स्थिति बन सकती है। समुद्र का पानी ज्यादा गर्म होने पर प्रवाल भित्तियों में कोरल ब्लीचिंग की समस्या बढ़ सकती है।
समुद्री तापमान में बदलाव का असर मछलियों के रहने और भोजन तलाशने के क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। इससे मछुआरों और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले उन समुदायों पर आर्थिक असर पड़ सकता है, जिनकी आजीविका समुद्री संसाधनों पर निर्भर है।
वैज्ञानिकों ने अभी से निगरानी बढ़ाने की मांग की
वैज्ञानिकों का कहना है कि संभावित बदलावों का अध्ययन नुकसान होने के बाद करने के बजाय पहले से तैयारी की जानी चाहिए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर मौसम केंद्रों की संख्या बढ़ाने, तापमान और नमी का रिकॉर्ड रखने तथा अलग-अलग क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।
पुराने सैटेलाइट आंकड़ों और लंबे समय से चल रहे पर्यावरणीय अध्ययनों की मदद से भी इस संभावित जलवायु बदलाव को समझने की कोशिश की जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार समय रहते निगरानी और शोध शुरू किए जाने से इस असामान्य मौसम के दौरान होने वाले महत्वपूर्ण पर्यावरणीय बदलावों को बेहतर तरीके से दर्ज किया जा सकेगा।
अल-नीनो को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके संभावित प्रभावों की निगरानी और उनसे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है। आने वाले महीने भारत के मौसम, पर्यावरण और जलवायु अनुसंधान के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।






