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नारायणपुर। बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमा

By NS
On: August 28, 2026 10:26 AM
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नारायणपुर। बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में आदिवासी संस्कृति की पहचान माने जाने वाले घोटुल की परंपरा एक बार फिर जीवंत होती नजर आ रही है। अंदरूनी गांवों में ग्रामीण स्थानीय लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक घोटुल का निर्माण कर अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में जुटे हैं। झारावाही जैसे गांवों में अब शाम होते ही घोटुल में युवाओं की चहल-पहल दिखाई देने लगी है।

बुजुर्ग दे रहे परंपरा और संस्कारों की सीख
आदिवासी समाज में घोटुल को केवल सामाजिक मेलजोल का स्थान नहीं माना जाता, बल्कि यह युवाओं के लिए संस्कृति, अनुशासन और सामुदायिक जीवन की पाठशाला भी है। यहां बुजुर्ग युवाओं को समाज के नियम-कायदे, परंपराएं, लोकगीत, नृत्य और सामुदायिक दायित्वों की जानकारी देते हैं। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लोक परंपराओं को पहुंचाने का काम जारी है।‘चेलिक-मोटियारिन’ के लोकगीतों से गूंज रही शाम

अबूझमाड़ की शामें भी धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक लय में लौट रही हैं। कभी नक्सली हिंसा और भय के कारण सूर्य ढलने के बाद गांवों में सन्नाटा पसर जाता था। ग्रामीण घरों से बाहर निकलने से भी कतराते थे। इसका असर घोटुल जैसी पारंपरिक संस्थाओं की गतिविधियों पर भी पड़ा था।
सुरक्षा के माहौल से बढ़ा ग्रामीणों का भरोसा

नक्सल प्रभाव में कमी और क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद ग्रामीणों में सुरक्षा का भरोसा बढ़ा है। अब युवा शाम के समय घोटुल पहुंच रहे हैं। वहां मांदर की थाप, लोकगीत और पारंपरिक नृत्य के बीच आदिवासी संस्कृति की पुरानी तस्वीर फिर दिखाई देने लगी है।
घोटुल की वापसी को अबूझमाड़ में केवल एक परंपरा के पुनर्जीवन के तौर पर नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन के फिर से मजबूत होने के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। स्थानीय ग्रामीण अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए पारंपरिक तरीके से घोटुल तैयार कर रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ी रहें।

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