जबलपुर आये हुए 3-4 बरस बीत जाने के बाद भी उनसे कोई औपचारिक परिचय न था। सभा-समारोहों में दिखते तो बस दुआ-सलाम हो जाती। ज्यादातर समय वे गम्भीर मुद्रा में ही नज़र आते। कभी-कभार हल्की मुस्कान भी पर दुर्लभ अवसरों पर। मेल-मुलाकात को लेकर इससे ज्यादा कोई सिलसिला नहीं था और मैं लगभग आश्वस्त था कि हो भी नहीं सकता। वे बड़े लेखक थे और मैं उनका अदना-सा पाठक।
सायास मिलता भी तो यही कह पता कि आपकी कहानियाँ पढ़ी हैं। यह भी नहीं कह पाता अच्छी लगती हैं, क्योंकि वे पलट पर पूछते ‘क्यों’ तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता। सच पूछें तो उनकी जैसी छवि थी और यहाँ आने के बाद जैसा उनके नजदीकी साथियों से सुन रखा था, मैं उनसे डरता था। अवसर या बहाने होने पर भी आखिर तक कभी उनसे अकेले जाकर बतियाने का साहस नहीं जुटा पाया। जब भी गया, किसी मित्र की आड़ लेकर गया।
एक दिन अचानक शहीद स्मारक में किसी नाटक को देखकर निकलते हुए चित्रकार मित्र अवधेश बाजपेयी ने मुझे उनके सामने खड़े करते हुए कहा, “ये दिनेश चौधरी हैं।” मैं हड़बड़ा गया। घबराहट में मुँह से बस यही निकला, “आपसे बहुत डर लगता है।” ज्ञान जी ने हँसते हुए कहा, “ये तो कॉम्प्लीमेंट नहीं हुआ।” मैं झेंपकर कोई और मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया देता, इससे पहले ही उन्होंने कहा, “कभी आइये तो बैठकर बातें करेंगे।” मुझे आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता हुई कि उन्होंने मुझे इस काबिल समझा कि बैठकर कुछ बातें कर सकते हैं।
ज्ञान जी का सूचना-तंत्र बहुत मजबूत था। साहित्य, कला औऱ इससे इतर हलकों में क्या कुछ घट रहा है, उन्हें सब खबर होती थी। में उन दिनों ‘शहरनामा जबलपुर’ के कुछ शुरुआती अध्याय लिख चुका था। शायद तीन या चार। इसके बाद लंबे समय तक गाड़ी अटकी हुई थी। लगा कि आगे नहीं कर पाऊँगा। बड़ा संकट यह था कि जिस जबलपुर पर मैं लिखना चाहता था, वह परसाई जी और ज्ञान जी के बगैर मुकम्मल नहीं हो सकता था।
परसाई जी पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि कुछ नया जुटा पाना मुमकिन नहीं लग रहा था। यह किस तरह हो पाया, इसकी अलग कहानी है। ज्ञान जी वाला मसला और टेढ़ा था। उन पर लिखने के लिए उनसे बात करना होता और बात करने का साहस मुझमें था नहीं। एक दिन नाटककार सीताराम सोनी की बिटिया की शादी में उनसे फिर मुलाकात हुई।
वही औपचारिक अभिवादन। मैं थोड़ी दूरी बनाकर बैठ गया। कुछ देर में वे खुद उठकर आये और कहा, ‘मैंने ‘शहरनामा जबलपुर’ के कुछ हिस्सों को पढा है। सारे तो नहीं पढ़ सका, कुछ को पढा है -“It was brilliant writing.” ज्ञान जी का इतना कहना किताब को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त था, पर मुझे हैरानी इस बात की थी कि उन्होंने मुझे पढ़ कहाँ से लिया? किताब के वे अंश आभासी दुनिया के कुछ मंचों पर थे, जहाँ ज्ञान जी के होने का कोई सुराग न था।
मुझे नहीं पता था कि उनके अति-सक्रिय खुफिया-तंत्र में ऐयारी करने वाले सूक्ष्म कैमरे लगे हुए हैं, जो उनके लिए दुनिया-जहान की सूचनाएँ बटोर लाते हैं। कौन क्या लिख रहा है, कौन नहीं लिख रहा है, किसने आयोजन के लिए कहाँ से माल जुटाया है; सारी सूचनाएं उनके पास अद्यतन होतीं। वे कभी किसी बात से बेखबर नहीं होते। जाने कैसे वे लोगों की पसंद-नापसंद को भी ताड़ लेते थे और इस आधार पर सही इंसान को सही जगह काम पर लगा देते।
‘पहल’ ने मशहूर शायर राजेश रेड्डी पर एक आयोजन किया तो मंच सज्जा पर अवधेश बाजपेयी ने अद्भुत काम किया था। मैं राजेश रेड्डी साहब के लिखे का मुरीद रहा हूँ। पता नहीं क्या सोचकर ज्ञान जी ने उन्हें भेड़ाघाट घुमाने की ड्यूटी पंकज के साथ मुझे सौंपी और उनसे खुलकर बातचीत करने का मौका मयस्सर कराया।
आधारताल में ज्ञान जी का घर शहर का साहित्यिक तीर्थ रहा। कोई रचनाकार बाहर से आये तो उनके ‘दर्शन’ जरूरी होते। उन्हें असुविधा भी होती। कोई फोन कर आना चाहे तो कई बार मना भी कर देते। किसी सूचना के बगैर आ धमकाने वालों का तो अलबत्ता कुछ नहीं किया जा सकता। कुछ के बारे में तो पता चला कि ज्ञान जी के यहाँ गये तो नये कपड़ें पहन लिये, गोया कोई उत्सव मनाने जा रहे हों। उनकी अपनी व्यस्त दिनचर्या थी। उम्र के आखिरी पड़ाव में थे।
सुनयना जी की दवाओं का ख्याल रखना होता था। ऐसे में कितनों को बर्दाश्त करें, जिनके पास कहने को सिर्फ यह हो कि हम आपके प्रशंसक है। दो-तीन मौकों पर खुद मैं प्रहलाद अग्रवाल जी के साथ गया। आखिरी बार जब गया था तो उन्होंने कहा कि आप लोग आते हैं और मैं पूरा वक्त देकर, खुलकर नहीं मिल पाता तो मुझे दुःख होता है।
प्रहलाद जी का कहना था कि मैं सूचना देकर तो नहीं जाऊँगा। जब ऐसी नौबत आएगी तो शायद नहीं जाऊँगा। मैंने कहा कि बगैर अनुमति जा धमकने पर डांट पड़ सकती है। प्रहलाद जी ने कहा कि ज्ञान जी से मिलने के लिए मैं उनके जूते भी खा सकता हूँ। लेकिन बीते साल के अंत में वे आए तो उहापोह में थे। जायें या न जायें? मैंने कहा, ‘आप रींवा से आए है, आपके मामले में छूट हो सकती है। चले जायें। वे नहीं गये। कहा अगली बार जाऊँगा। अगला मौका भला अब कहाँ मिलना था?
शहर के बाहर साहित्यिक आयोजनों में जाना उन्होंने लगभग बंद ही कर दिया था। पक्के तौर पर मुझे दो ही आयोजनों की याद है, जो मेरी जानकारी में हैं और वे पिछले दिनों में शहर से बाहर निकले थे। बेटे पाशा के पास नागपुर आना-जाना तो खैर नियमित ही था- मैं साहित्यिक आयोजनों की बात कर रहा हूँ। एक तो ‘अमर उजाला’ का लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड था, जो उन्हें गुलज़ार साहब ने भेंट किया था। आयोजन की तस्वीर उनके ड्राइंग रून में लगी हुई थी।
शायद उसी शो केस की तरफ जहाँ एक पुराना म्यूजिक सिस्टम रखा हुआ था। दूसरा आयोजन बाँदा का था, जो उनके सम्मान में मित्र लेखकों ने किया था। बाँदा रेलवे स्टेशन में सुनयना जी का हाथ पकड़े हुये ज्ञान जी की तस्वीर सब जगह उपलब्ध है। यह उनकी सबसे खूबसूरत तस्वीरों में से एक है। ज्ञान जी ने इतनी लंबी यात्रा सुनयना जी का हाथ थामे हुए ही तो पूरी की।
शहर में होने वाले साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के कर्ताधर्ता ज्ञान जी की उपस्थिति का अर्थ समझते थे। मलय जी के सम्मान में होने वाले एक आयोजन की शुरुआत में कवि-मित्र सुधीर सक्सेना ने मुझसे कहा कि देखना होगा कि ज्ञान जी आते हैं या नहीं, उनका आना और न आना दोनों ही महत्वपूर्ण होता है।
ज्ञान जी आये और आकर पीछे बैठ गए। मंच से वे परहेज करने लगे थे। ‘पहल’ सम्मान में भी वे कभी मंच पर नहीं होते थे। कोई बहुत आग्रह करे तो थोड़े विचलित हो जाते थे। उनका चयन बहुत स्पष्ट था। आयोजन कौन कर रहा है, कहाँ से संचालित है और उसकी मंशा क्या है। यह नहीं कि आज के रचनाकारों की तरह से कहीं से भी बुलावा आया तो झोला उठाकर चल दिये। स्थानीय आयोजनों का स्वरूप और उसकी परिकल्पना उनके आने या न आने की सूचना से प्रभावित होता। मैं अकेले ज्ञानरंजन से नहीं डरता था, आयोजक भी डरते थे। जेहन में यह बात जमी होती कि ज्ञान जी क्या सोचेंगे?
यह डर जाहिर है कि किसी सत्ता की ताकत, आतंक या धनबल-बाहुबल का नहीं हो सकता था। यह ज्ञान व विद्वता का आतंक भी नहीं था। ज्ञान जी बेहद सहज थे। बेहद कम उम्र वाले मित्रों के साथ भी सहज होते। प्रयास करते कि उनके आगे कोई असुविधा न हो। किससे, क्या संवाद करना है, यह उनसे बेहतर भला कौन जान सकता है?
जाहिर है कि ज्ञान जी से डरने का मेरा आशय स्पष्ट रूप से उनका लिहाज करना था। वह लिहाज जो मूर्खता के चरम आत्मविश्वास के कारण इन दिनों में खत्म होता जा रहा। यह अभिव्यक्ति की स्वछन्दता का दौर है। जिसके मन में जो आये कह देता है, जबकि दानिश लोगों के आगे चुप रहकर सुनने की कला कुछ अल्प मात्रा में ही सही, पर होनी चाहिये।
अब ज्ञान जी नहीं रहे तो पता नहीं स्थानीय साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का स्वरूप क्या होगा? वे थे तो यहाँ की पढ़ने-लिखने-रचने वाली बिरादरी एक सामाजिक-शिष्टाचार से बंधी हुई थी। एक छाया -सी थी। सभा-समारोह में न भी आयें तो उनके होने का एहसास रहता था। काश कि यह एहसास कभी खत्म न हो और न ही उनकी अनुपस्थिति का अर्थ कभी समझ में आये। ज्ञान जी का डर बना रहना चाहिए। मुल्क और समाज की बेहतरी के लिए तर्क, विवेक और ज्ञान का डर जरूरी है।

