भारत-नेपाल संबंधों में नई खटास

NFA@0298
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भारत और नेपाल के बीच संबंध न केवल भौगोलिक निकटता पर टिका है, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गहरी जड़ों पर भी आधारित है। दोनों देशों के लोग रोटी-बेटी के रिश्ते से बंधे हैं। साझा विरासत, भाषाई समानताएं, विवाह संबंध और रोजमर्रा की आवाजाही ने एक खुली सीमा को जीवंत रखा है।

1950 की भारत-नेपाल शांति और मित्रता संधि ने इस खुली सीमा को औपचारिक मान्यता दी, जिससे लोगों और माल की निर्बाध आवाजाही संभव हुई। नेपाल के कुल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 60-65 फीसदी है, जबकि भारत नेपाल को विकास सहायता, ऊर्जा, और आवश्यक वस्तुओं का प्रमुख स्रोत रहा है।

लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इन संबंधों में एक नई खटास पैदा कर दी है। नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने सीमा पर कस्टम नियमों का सख्ती से लागू करना शुरू किया है। इसके तहत भारत से लाई जाने वाली 100 नेपाली रुपए से अधिक मूल्य की किसी भी वस्तु पर 5 से 80 फीसदी तक कस्टम ड्यूटी लगाई जा रही है। नेपाल सरकार ने इसके पीछे अवैध व्‍यापार रोकने की मंशा जाहिर की है।

इस फैसले के तुरंत बाद नेपाल के विभिन्न हिस्सों खासकर सीमा क्षेत्रों में व्यापक प्रदर्शन शुरू हो गए। लोग इसे अघोषित नाकाबंदी की तरह देख रहे हैं। सीमा के दोनों ओर के लाखों परिवारों की जीविका इससे सीधे प्रभावित हुई है। नेपाल के नागरिक जो बॉर्डर बाजारों से सस्ता सामान लाते थे, अब महंगे पड़ रहे हैं। वहीं भारतीय सीमा के दुकानदारों, ऑटो-रिक्शा चालकों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की आमदनी में भारी गिरावट आई है।

यह पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध तनावपूर्ण हुए हों। सितंबर 2015 में नेपाल के नए संविधान को लेकर मधेसी समुदायों के आंदोलन के दौरान भारत-नेपाल सीमा पर माल ढुलाई लगभग 134 दिनों तक प्रभावित रही थी। नेपाल ने इसे भारतीय नाकाबंदी करार दिया था, जबकि भारत ने इसे आंतरिक आंदोलन का परिणाम बताया था। इस घटना ने दोनों पक्षों में अविश्वास की एक लंबी छाया छोड़ी और नेपाल में कुछ राजनीतिक दलों ने चीन की ओर झुकाव बढ़ाया।

आज की स्थिति अलग है, लेकिन असर समान रूप से चिंताजनक है। बालेन शाह को सरकार बनाए एक महीना भी नहीं बीता कि दो मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा और अब कस्टम नीति पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। यह दर्शाता है कि अनुभवहीन नेतृत्व के साथ बड़े फैसले लेना कितना जोखिम भरा हो सकता है। इस घटना से यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि कहीं चीन के दवाब में तो नेपाल ने यह फैसला लागू नहीं कर दिया। अगर ऐसा है तो यह भारत के लिए चिंता का सबब होना चाहिए।

नेपाल-भारत खुली सीमा संवाद समूह जैसी संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि नए नियम सीमा क्षेत्रों के निवासियों पर अनावश्यक बोझ डाल रहे हैं। सदियों पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक कई रस्मों में दोनों देशों के लोग एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। इस नीति से न केवल दैनिक उपभोक्ता प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि लंबे समय में द्विपक्षीय व्यापार, पर्यटन और लोगों के बीच विश्वास भी कमजोर हो सकता है।

भारत के लिए भी यह महत्वपूर्ण है। सीमा क्षेत्रों बिहार, यूपी, उत्तराखंड की स्थानीय अर्थव्यवस्था इस क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड पर टिकी हुई है। साथ ही नेपाल भारत का एक महत्वपूर्ण पड़ोसी है, जहां सुरक्षा, जल संसाधन, ऊर्जा सहयोग और कनेक्टिविटी के बड़े हित जुड़े हैं।

बालेन शाह को सतर्क रहना चाहिए। उनकी सरकार अभी एक महीने भी पूरी नहीं हुई है और पहले ही आर्थिक नीति पर व्यापक असंतोष उभर रहा है। दूरगामी असर यह हो सकता है कि नेपाल की अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका पर सवाल उठें, जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों देश एक-दूसरे के पूरक हैं। चीन पड़ोसी तो है, लेकिन भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भारत की निकटता अद्वितीय है।

भारत सरकार का दायित्व भी है कि वह इस मामले में संयम बरते। सीधा हस्तक्षेप न करते हुए भी व्यापारिक हितों, सीमा क्षेत्रों के लोगों की आजीविका और सदियों पुराने संबंधों को मजबूत रखने के लिए उच्चस्तरीय बातचीत शुरू करे। संधि की भावना को बनाए रखते हुए व्यावहारिक समाधान तलाशे जाएं।

दोनों देशों के बीच खुली सीमा एक संपदा है, न कि समस्या। इसे बनाए रखने और मजबूत करने के लिए जनहितैषी, व्यावहारिक और संवेदनशील कदम उठाने की जरूरत है। अन्यथा छोटे-छोटे फैसले बड़े अविश्वास को जन्म दे सकते हैं, जिसका खामियाजा दोनों पक्षों के आम नागरिकों को उठाना पड़ेगा। रोटी-बेटी के रिश्ते को राजनीतिक प्रयोगों से ऊपर रखना ही दोनों देशों की दीर्घकालिक भलाई है।



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