

आदिवासियों में कई दशकों से चली आ रही परंपरा
-नरेश शर्मा
रायगढ़, 28 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में शादी का पवित्र बंधन सिर्फ सात फेरों से नहीं, बल्कि ढोल-नगाड़ों की गंूज में नये दुल्हा-दुल्हन को जलते हुए अंगारों पर चलाकर पिछले कई दशकों से यह परंपरा निभाई जाती है। यह अनोखी परंपरा न केवल गांव में बल्कि पूरे जिले में चर्चा का विषय बन चुका है।
युग बदला, पर नहीं बदली परम्परा
रायगढ़ जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर स्थित बिलासपुर गांव में अनोखी शादी की परंपरा पिछले कई दशकों से चली आ रही है। घर के मुखिया महेत्तर राठिया ने बताया कि जयप्रकाश राठिया घर का सबसे छोटा लड़का है, उसके बड़े भाई के अलावा तीन बहनों की शादी हो चुकी है।
उन्होंने बताया कि राठिया परिवार के गंधेल गोत्र के लोग जब शादी करके दुल्हन घर लाते हैं, तब घर के देवी देवताओं की पूजा-अर्चना करके शादी के लिए सजाए गए मंडप में अंगारा बिछाकर दुल्हा – दुल्हन के अलावा परिवार के अन्य सदस्य नंगे पांव चलकर इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि दुल्हन घर से विदाई के बाद से दुल्हा – दुल्हन के अलावा परिवार के कुछ सदस्यों का उपवास शुरू हो जाता है, इस दौरान वे लोग पानी तक ग्रहण नहीं करते। इस शादी को देखने गांव के लोगों के अलावा दूसरे गांव से भी लोग भारी संख्या में पहुंचते हैं।
घर के मुखिया पर होता है देवता सवार
इस अनोखी शादी की परंपरा के दौरान मंडप में पहले बकरे की बलि देते ही घर के मुखिया पर देवता सवार हो जाता है और फिर वह बलि दिए बकरे से पूजा पाठ करता है, उसके बाद वो नाचते-झुमते जलते हुए अंगारों को मंडप पर बिछाना शुरू कर देता है। जिस पर वह स्वयं, दुल्हा, नई दुल्हन के अलावा परिवार के अन्य सदस्य नंगे पैर चलकर फेरे लेते हैं इसके बावजूद उनके पैरों में जरा भी जलन तो दूर जख्म तक नहीं होता, जो कि अपने आप में आश्चर्य की बात है।
परिवार के सदस्य रहते हैं उपवास
राठिया परिवार के सदस्यों ने बताया कि परिवार के कई सदस्य आज सुबह से उपवास हैं। दुल्हन को अपने गांव लाने के बाद घर के बाहर पहले एक बकरे की बलि देकर उसके खून से तिलक लगाकर दूल्हा- दुल्हन को घर में प्रवेश कराया गया, उसके बाद दुल्हे के मंडप के नीचे देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करके दूसरे बकरे की बलि देने के बाद घर के कई सदस्यों ने अंगारों में चलने की परंपरा को निभाया।
कई बरस से चली आ रही परंपरा
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बिलासपुर गांव की जनसंख्या करीब 11 सौ है और इस गांव में राठिया परिवार के गंधेल गोत्र के दो ही परिवार हैं। उनका कहना है कि वे लोग अपने बचपन से देखते आ रहे हैं, जब भी इस परिवार में शादी होती है, दुल्हा, दुल्हन और परिवार के कई सदस्य अंगारों पर चलकर इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।
दी जाती है दो बकरों की बलि
शादी के बाद दूल्हा जब दुल्हन लेकर अपने गांव लौटता है, तब उन्हें घर के बाहर ही किसी और की परछी में घंटों तक भूखे प्यासे ही रुकाया जाता है, जिसके बाद एक बकरे की बलि देकर खून से तिलक लगाकर दुल्हा और नई दुल्हन को घर में प्रवेश कराया जाता है और मंडप में पहुंचते ही दूसरे बकरे की बलि दी जाती है। इस अनोखी परंपरा को देखने दूसरे गांव से भी लोग भारी संख्या में पहुंचते हैं।
परंपरा निभाना क्यों जरूरी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता द्वारा राठिया परिवार के सदस्यों से इस अनोखी परंपरा को बदलते परिवेश के बाद भी कई दशकों से आज तक मनाने के संबंध में पूछने पर उन्होंने बताया कि इस परंपरा को नहीं मनाने पर उनके घर के देवी-देवता नाराज हो जाएंगे और परिवार में कुछ अनिष्ठ हो सकता है। इस लिहाज से उनका पूरा परिवार यह परंपरा पिछले कई दशकों से निभाते आ रहा है और आगे भी निभाते रहेंगे।


