यूपी की चुनावी बिसात पर Akhilesh Yadav की चुनौती

NFA@0298
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देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में छह-सात महीना दूर विधानसभा चुनाव की बिसात जमने लगी है और मुद्दे भी, जैसा कि दो दिन के दौरान के घटनाक्रम बताते हैं। दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आगामी बकरीद के बहाने सड़कों पर नमाज न पढ़ने की हिदायत देकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी, तो आज सपा सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ऐलान किया है कि राज्य की सत्ता में आते ही वे 69 हजार शिक्षकों की भर्ती के मामले का निराकरण करेंगे, जिसमें हजारों युवाओं को कथित रूप से आरक्षण से वंचित कर दिया गया।

अखिलेश ने बकायदा पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) आडिट जारी करते हुए भाजपा पर आरक्षण की लूट करने का आरोप लगाया है। यही नहीं, उन्होंने सरकार में आते ही जाति जनगणना कराने का भी वादा कर दिया है।

अखिलेश ने 2023 में पीडीए का फॉर्मूला ईजाद किया था और 2024 के लोकसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश में इसका असर भी देखा गया। 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के गठबंधन ने 43 सीटें जीत ली थी। सपा को 37 सीटें मिली, जबकि भाजपा की अगुआई वाले एनडीए 28 सीटें गंवा कर 36 सीटों पर अटक गया था। वास्तव में ये नतीजे भाजपा के लिए कहीं बड़ा झटका थे, क्योंकि सूबे में भाजपा को सिर्फ 33 सीटें मिली थीं। यूपी में मिले तगड़े झटके के कारण भाजपा बहुमत से दूर 240 सीटों पर अटक गई थी।

ऐसे में हालिया पांच राज्यों के चुनाव में भी देखा गया कि भाजपा ने कैसे हिंदुत्व के मुद्दे को धार दी है और एसआईआर के बहाने अल्पंसख्यकों पर निशाना साधा है। इसीलिए यूपी में योगी आदित्यनाथ के नमाज वाले फरमान के अंतर्निहित पाठ को समझने में चूक नहीं की जानी चाहिए।

आरक्षण के मुद्दे पर मोदी सरकार और भाजपा बैकफुट पर है। मोदी सरकार ने भले ही जाति आरक्षण कराने का एलान किया है, लेकिन हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव के दौरान उसने महिला आरक्षण के मुद्दे को परिसीमन से जोड़ा था, तो जनसंख्या के मुद्दे पर उसकी नीयत पर सवाल उठ गए।

उत्तर प्रदेश में आरक्षण और भर्तियां बड़ा मुद्दा है। हालत यह हो गई कि प्रदर्शन कर रहे हजारों बेरोजगार युवाओं पर सूबे के कई शहरों में पुलिस ने लाठियां तक बरसाई हैं।

अखिलेश ने तीखा हमला करते हुए कहा है, कि यदि युवाओं को संवैधानिक प्रावधानों पर अमल करवाने के लिए कोर्ट के दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, तो समझा जा सकता है कि सरकार पक्षपाती है। अखिलेश ने लैटरल एंट्री पर भी सवाल उठाया है और कहा कि इसके जरिये आरक्षण को कमजोर किया जा रहा है।

जाहिर है, अखिलेश ने पीडीए के मुद्दे पर एक बड़ा दांव तो चल ही दिया है और यह बड़ा मुद्दा इसलिए भी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध आरक्षण से है। ऐसे में यह देखना होगा कि भाजपा अखिलेश के पीडीए की काट किस तरह निकालती है।

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