
भारत निर्वाचन आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिए गए विवादित ‘आतंकवादी’ बयान को लेकर नोटिस जारी किया है। यह उचित ही है कि देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी भाषा के इस्तेमाल पर कार्रवाई की गई। मल्लिकार्जुन खरगे का बयान लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है और संसदीय लोकतंत्र में मर्यादित बयानबाजी ही अपेक्षित है। चाहे वह किसी के ही खिलाफ हो। लेकिन क्या चुनाव आयोग की नजरें प्रधानमंत्री पर की गई ऐसी टिप्पणी के अलावा कहीं और भी हैं ?
क्या पांच राज्यों के इस चुनाव में सिर्फ मल्लिकार्जुन खरगे का बयान ही संज्ञान में लेने लायक था ? क्या आयोग ने देश के सात सौ से अधिक नागरिकों के उस पत्र पर कोई टिप्पणी की है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसद में महिला संशोधन बिल के गिरने के बाद राष्ट्र के नाम प्रसारण को आदर्श अचार संहिता का खुला उल्लंघन कहा है ?
इन नागरिकों ने जिनमें पूर्व सिविल सेवक, शिक्षाविद्, कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हैं, ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि यह संबोधन अचार संहिता का उल्लंघन है। उन्होंने जांच और उचित कार्रवाई की मांग की है। अपने इस संबोधन में श्री मोदी ने विपक्षी दलों का नाम ले ले कर उन्हें कोसा था। इस पत्र में नरेंद्र मोदी के संबोधन को चुनावी प्रचार और पक्षपाती प्रचार कहा गया पर देश के इन सात सौ से अधिक नागरिकों की चिट्ठी शायद अभी आयोग की मेज तक पहुंची ही नहीं है!
चुनाव आयोग को तो उस स्पेशल ट्रेन का भी संज्ञान लेना चाहिए था जो सूरत से वोटरों को लेकर बंगाल निकली थी। इसे लेकर विपक्ष खासतौर पर तृणमूल कांग्रेस भाजपा और केंद्र सरकार के खिलाफ आरोपों के साथ मैदान में है। दिलचस्प यह है इस मामले में विपक्ष के आरोपों का जवाब भाजपा तो दे रही है लेकिन तृणमूल कांग्रेस की शिकायत को शायद अभी आयोग से पावती का ही इंतजार है!
तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूची में हेराफेरी का आरोप लगाया और यहां तक कहा कि ट्रेनों में जिन्हें बंगाल पहुंचने के लिए ढोया गया उनमें फर्जी मतदाता भी हो सकते हैं। चुनावी बंगाल से एक जिम्मेदार दल की ओर से आई शिकायत को अभी तक जवाब का इंतजार ही होगा!
आज पांच राज्यों के चुनाव के बीच महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पास करवाने के लिए लोकसभा का विशेष सत्र बुलाया जाता है, विधेयक गिर जाता है और उसके बाद प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं – सरकारी चैनल पर। इसकी शिकायत होती है और आयोग उस शिकायत पर कान भी नहीं देता!
यह दुर्भाग्यजनक है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले देश में निष्पक्ष चुनाव की जिम्मेदारी जिस संस्था पर है उसकी निष्पक्षता और तटस्थता पर लगातार सवाल हो रहे हैं। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को देश में निष्पक्ष चुनाव की जिम्मेदारी सौंपता है।
दुर्भाग्य है कि चुनाव आयोग नाम की इस संस्था के मुखिया की ही भूमिका पर सवाल हैं। आयोग और उसके मुखिया की निष्पक्षता पर उठे सवालों की लंबी लिस्ट है लेकिन दुर्भाग्य ही है कि इनकी दिलचस्पी तटस्थ होना छोड़िए,तटस्थ दिखने में भी नजर नहीं आती।
दुर्भाग्य है कि चुनाव के दौरान हर रोज ढेरों नोटिसें जारी करते रहने वाला आयोग सत्तारूढ़ दल के मामले में सिलेक्टिव नजर आता है। आज कम से कम इतनी अपेक्षा तो है कि आयोग सामने आ कर इन शिकायतों पर अपना स्टैंड सामने रखे। देश को बताए कि शिकायतें आईं और उनकी जांच भी की है। अभी तो कुछ भी साफ नहीं है।
लोकतंत्र में अचार संहिता कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि उस नैतिक आचरण की नींव है जिसके आधार पर निष्पक्ष चुनाव की इमारत आकार लेती है। आयोग का निष्पक्ष होना ही नहीं निष्पक्ष दिखना भी जरूरी है। यह देश को भरोसा देता है कि लोकतंत्र सुरक्षित हाथों में है। आज आयोग के रवैए से यह भरोसा दरकता नजर आता है।


