वाराणसी। Sarnath UNESCO World Heritage: भारत की समृद्ध बौद्ध और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। वाराणसी के पास स्थित प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। लंबे समय से इस उपलब्धि का इंतजार किया जा रहा था। सारनाथ 3 जुलाई 1998 से UNESCO की संभावित सूची में शामिल था और अब इसे विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से देशभर में खुशी का माहौल है।
सारनाथ वाराणसी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थस्थलों में इसकी गिनती होती है। भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े होने के कारण इस स्थान का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। यहां प्राचीन स्तूप, मठ और मौर्यकालीन अवशेष मौजूद हैं, जो भारत की हजारों साल पुरानी विरासत की कहानी बताते हैं।

PM मोदी ने बताया सभ्यतागत विरासत का उत्सव
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर खुशी जाहिर की। उन्होंने इसे भारत की गहरी सभ्यतागत और आध्यात्मिक विरासत का उत्सव बताया।
सारनाथ का बौद्ध धर्म के इतिहास में विशेष स्थान है। भगवान गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं दिया था, जिसे बौद्ध परंपरा में ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के रूप में जाना जाता है। इसी कारण दुनियाभर से बड़ी संख्या में बौद्ध श्रद्धालु और पर्यटक सारनाथ पहुंचते हैं।
उपराष्ट्रपति ने बताया राष्ट्रीय गौरव का क्षण
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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भी सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने इसे राष्ट्रीय गौरव का क्षण बताते हुए सारनाथ को भारत की आध्यात्मिक विरासत का स्थायी प्रतीक बताया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस उपलब्धि का स्वागत किया। उन्होंने सारनाथ को प्रदेश की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।
1998 से UNESCO की संभावित सूची में था सारनाथ
सारनाथ को UNESCO की विश्व धरोहर सूची में स्थान मिलने की यात्रा काफी लंबी रही है। यह स्थल 3 जुलाई 1998 से UNESCO की संभावित यानी Tentative List में शामिल था। करीब 28 साल बाद इसे विश्व धरोहर सूची में स्थान मिलने को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
सारनाथ में मौजूद ऐतिहासिक स्मारक और पुरातात्विक अवशेष बौद्ध धर्म के विकास की कहानी को दर्शाते हैं। यहां का धमेख स्तूप विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके अलावा चौखंडी स्तूप, प्राचीन मठों के अवशेष और अशोककालीन धरोहरें भी इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाती हैं।
करीब 2,500 वर्षों से तीर्थयात्रा की परंपरा
सारनाथ की पहचान केवल पुरातात्विक स्थल के रूप में नहीं है। यहां करीब 2,500 वर्षों से बौद्ध तीर्थयात्रा की परंपरा चली आ रही है। भारत के अलावा श्रीलंका, थाईलैंड, जापान, म्यांमार, तिब्बत और दुनिया के कई अन्य हिस्सों से बौद्ध श्रद्धालु सारनाथ पहुंचते हैं।
यहां मौजूद अवशेषों में प्राचीन बौद्ध मठों के जीवन, वास्तुकला और कला के शुरुआती तथा महत्वपूर्ण उदाहरण देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि सारनाथ का महत्व किसी एक स्मारक तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा क्षेत्र बौद्ध सभ्यता और संस्कृति के विकास का प्रमाण माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के लिए भी बड़ी उपलब्धि
सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में जगह मिलना उत्तर प्रदेश के लिए भी खास महत्व रखता है। राज्य में पहले से मौजूद प्रमुख UNESCO विश्व धरोहर स्थलों में ताजमहल, आगरा का किला और फतेहपुर सीकरी शामिल हैं, जो आगरा क्षेत्र में स्थित हैं।
अब सारनाथ के शामिल होने से उत्तर प्रदेश की UNESCO विश्व धरोहर पहचान का विस्तार पूर्वी उत्तर प्रदेश तक हुआ है। इसके साथ ही प्रदेश की बौद्ध विरासत को भी वैश्विक मंच पर नई पहचान मिली है।
पर्यटन को मिल सकती है नई रफ्तार
विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद सारनाथ की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होने की उम्मीद है। इससे वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक तथा सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है।
वाराणसी पहले से ही दुनिया के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल है। ऐसे में सारनाथ को UNESCO विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से देश-विदेश के पर्यटकों के बीच इस क्षेत्र का आकर्षण और बढ़ने की संभावना है।
सारनाथ का विश्व धरोहर सूची में शामिल होना भारत के लिए सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल को मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं, बल्कि देश की हजारों साल पुरानी बौद्ध, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को मिली वैश्विक पहचान के रूप में भी देखा जा रहा है।






