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ISRO का आज सबसे बड़ा इम्तिहान, EOS-05 सैटेलाइट होगा लॉन्च

By NS
On: September 3, 2026 4:44 PM
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GSLV-F17 लॉन्च क्यों है खास?

GSLV-F17 तीन चरणों वाला भारी रॉकेट है, जिसकी लंबाई करीब 51.7 मीटर और वजन लगभग 420.5 टन है। इसके जरिए 2367 किलोग्राम वजनी EOS-05 को अंतरिक्ष में पहुंचाया जाएगा। यह GSLV की महत्वपूर्ण उड़ानों में से एक है और इसके सफल होने पर भारत की भारी सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता को और मजबूती मिलेगी।

EOS-05 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से प्रक्षेपित किया जाएगा। सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा तक पहुंचाने के लिए GSLV-F17 के अलग-अलग चरण तय प्रक्रिया के अनुसार काम करेंगे।

36 हजार किलोमीटर ऊपर से होगी लगातार निगरानी

EOS-05 की सबसे खास बात इसकी कक्षा है। पृथ्वी से करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित होने के बाद यह बड़े क्षेत्र पर लगातार निगरानी रखने में सक्षम होगा।

लो अर्थ ऑर्बिट यानी कम ऊंचाई वाली कक्षा में मौजूद सैटेलाइट किसी इलाके के ऊपर से गुजरने के दौरान ही उसकी तस्वीरें और जानकारी जुटा पाते हैं। इसके मुकाबले EOS-05 को ऐसी कक्षा में रखा जाएगा, जहां से यह लंबे समय तक एक बड़े क्षेत्र पर नजर रख सकेगा।

इसी वजह से इसे भारत की अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमता के लिए महत्वपूर्ण मिशन माना जा रहा है।

मौसम से लेकर आपदा प्रबंधन तक आएगा काम

EOS-05 से मिलने वाली इमेजिंग और अन्य जानकारियां कई क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती हैं। मौसम की निगरानी से लेकर प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति का आकलन करने तक सैटेलाइट अहम भूमिका निभा सकता है।

इसके जरिए चक्रवात, बाढ़ और जंगल की आग जैसी घटनाओं पर नजर रखने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा पर्यावरण में होने वाले बदलावों और कृषि से जुड़े क्षेत्रों की निगरानी में भी सैटेलाइट डेटा उपयोगी साबित हो सकता है।

रणनीतिक नजरिए से भी बड़े क्षेत्र की लगातार निगरानी भारत की क्षमता को मजबूत कर सकती है।

GSLV-F17 कैसे EOS-05 को कक्षा में पहुंचाएगा?

GSLV-F17 सैटेलाइट को सीधे 36 हजार किलोमीटर की अंतिम कक्षा में स्थापित नहीं करेगा। रॉकेट पहले EOS-05 को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाएगा।

इसके बाद सैटेलाइट में मौजूद ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम काम करेगा। इसकी मदद से EOS-05 धीरे-धीरे अपनी कक्षा की ऊंचाई बढ़ाएगा और निर्धारित जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचेगा।

मिशन का यह चरण बेहद महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि सैटेलाइट को सही कक्षा और सही स्थिति में स्थापित करना पूरे अभियान की सफलता के लिए जरूरी है।

पहले भी हो चुकी है ऐसी कोशिश

इस तरह के इमेजिंग सैटेलाइट को अंतरिक्ष में स्थापित करने की कोशिश पहले भी की जा चुकी है। अगस्त 2021 में GSLV-F10 के जरिए GISAT-1 मिशन लॉन्च किया गया था, लेकिन क्रायोजेनिक अपर स्टेज में आई तकनीकी समस्या के कारण मिशन सफल नहीं हो पाया था।

लॉन्च के शुरुआती चरण सामान्य रहे, लेकिन क्रायोजेनिक चरण में समस्या आने के बाद सैटेलाइट को उसकी निर्धारित कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका।

ऐसे में मौजूदा मिशन को उस अनुभव के बाद एक महत्वपूर्ण अगला कदम माना जा रहा है।

GSLV को क्यों कहा जाता है ‘नॉटी बॉय’?

GSLV की विकास यात्रा कई चुनौतियों से भरी रही है। शुरुआती 18 उड़ानों में से छह में इसे पूरी सफलता नहीं मिल सकी थी। इसके अप्रत्याशित प्रदर्शन के कारण इसे इसरो के भीतर कभी-कभी ‘नॉटी बॉय’ भी कहा गया है।

हालांकि समय के साथ रॉकेट की तकनीक में सुधार हुआ है। खास तौर पर स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक के विकास ने भारत की भारी सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता को मजबूत किया है।

आज की उड़ान भी GSLV के प्रदर्शन और इसकी तकनीकी विश्वसनीयता की एक अहम परीक्षा होगी।

क्रायोजेनिक इंजन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

GSLV की ताकत में क्रायोजेनिक अपर स्टेज की बड़ी भूमिका है। क्रायोजेनिक इंजन में बेहद कम तापमान पर रखे गए लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन जैसे प्रोपेलेंट का इस्तेमाल किया जाता है।

यह तकनीक बेहद जटिल मानी जाती है। भारत ने इस तकनीक को विकसित करने के लिए लंबे समय तक काम किया और कई परीक्षणों व चुनौतियों के बाद स्वदेशी क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम विकसित किया।

भारी सैटेलाइट को ऊंची कक्षा में पहुंचाने के लिहाज से यह तकनीक बेहद महत्वपूर्ण है।

अमेरिका और चीन जैसे देशों से मुकाबले में बढ़ेगी क्षमता

अंतरिक्ष से पृथ्वी की निगरानी आज दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों की महत्वपूर्ण क्षमता है। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों के पास अलग-अलग प्रकार के उन्नत पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट हैं।

EOS-05 के जरिए भारत जियोसिंक्रोनस कक्षा से बड़े क्षेत्र की निगरानी करने की अपनी क्षमता को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई से एक बड़े क्षेत्र पर नजर रखने की क्षमता मौसम, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के साथ रणनीतिक जरूरतों में भी उपयोगी हो सकती है।

PSLV से अलग है GSLV का मिशन

हाल के समय में ISRO के भरोसेमंद PSLV को भी कुछ मिशनों में तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हालांकि PSLV और GSLV अलग-अलग लॉन्च व्हीकल हैं और दोनों की प्रणोदन प्रणालियां भी अलग हैं।

इसलिए PSLV से जुड़ी समस्याओं को सीधे GSLV-F17 के प्रदर्शन से जोड़ना उचित नहीं होगा। आज का मिशन मुख्य रूप से GSLV और उसकी क्रायोजेनिक तकनीक की क्षमता की परीक्षा है।

भारत के लिए क्यों अहम है EOS-05 मिशन?

EOS-05 की सफलता भारत की अंतरिक्ष आधारित पृथ्वी निगरानी क्षमता को नई मजबूती दे सकती है। सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरें और डेटा मौसम, पर्यावरण, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

प्राकृतिक आपदा के समय किसी प्रभावित क्षेत्र की लगातार निगरानी राहत और बचाव एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वहीं चक्रवात जैसी घटनाओं की निगरानी से समय पर तैयारियां करने में भी मदद मिल सकती है।

रणनीतिक स्तर पर भी अंतरिक्ष से बड़े क्षेत्र की लगातार निगरानी किसी देश की तकनीकी और सुरक्षा क्षमता को मजबूत करती है।

आज इसरो की नजर पूरे मिशन की सफलता पर

GSLV-F17 के उड़ान भरने के बाद भी वैज्ञानिकों के सामने कई महत्वपूर्ण चरण होंगे। रॉकेट को सैटेलाइट को सही ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाना होगा और इसके बाद EOS-05 को अपने प्रोपल्शन सिस्टम के जरिए निर्धारित कक्षा तक पहुंचना होगा।

इसलिए आज का मिशन केवल रॉकेट के सफल प्रक्षेपण तक सीमित नहीं है। EOS-05 का सही कक्षा में स्थापित होना ही इस पूरे अभियान की असली सफलता होगी।

अगर मिशन सफल रहता है तो यह भारत की अंतरिक्ष आधारित निगरानी क्षमता को नई ऊंचाई देने के साथ GSLV की विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगा।



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