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मां चलाती थीं चाय-समोसे की दुकान, कभी खाने के भी थे लाले; संघर्ष से निकलकर चैंपियन बनीं मीराबाई चानू

By NS
On: July 26, 2026 8:53 PM
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नई दिल्ली। Mirabai Chanu: कभी परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि खेल के लिए जरूरी सुविधाएं और बेहतर डाइट जुटाना भी मुश्किल था। मां छोटी सी चाय-समोसे की दुकान चलाती थीं और पिता सीमित आमदनी में परिवार का खर्च संभालते थे। ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे, लेकिन इन मुश्किलों के बीच मीराबाई चानू ने अपने सपने को कमजोर नहीं पड़ने दिया। लगातार मेहनत और मजबूत इरादों के दम पर उन्होंने भारतीय वेटलिफ्टिंग में अपनी अलग पहचान बनाई और दुनिया के बड़े मंचों पर देश का नाम रोशन किया।

मीराबाई चानू का सफर उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को पूरा करना मुश्किल समझते हैं। मणिपुर के एक साधारण परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के उनके सफर में आर्थिक तंगी से लेकर ट्रेनिंग की मुश्किलों तक कई चुनौतियां आईं।

छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं मीराबाई

साल 1994 में जन्मीं मीराबाई चानू मणिपुर के इम्फाल ईस्ट जिले के नोंगपोक काकचिंग गांव से आती हैं। वह अपने माता-पिता की छह संतानों में सबसे छोटी हैं। उनका परिवार आर्थिक रूप से बेहद साधारण था।

उनके पिता साइखोम कृति मैतेई निर्माण कार्य से जुड़े थे, जबकि उनकी मां साइखोम तोम्बी देवी परिवार की आर्थिक मदद के लिए गांव में छोटी सी चाय और समोसे की दुकान चलाती थीं। सीमित आमदनी में आठ सदस्यों वाले परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था।

खेल के लिए जरूरी डाइट जुटाना भी था मुश्किल

वेटलिफ्टिंग जैसे खेल में खिलाड़ी को नियमित अभ्यास के साथ पोषण से भरपूर डाइट की जरूरत होती है। लेकिन मीराबाई के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनके लिए हर समय खेल के हिसाब से जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।

इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा। सुविधाओं की कमी उनके लक्ष्य के रास्ते में जरूर चुनौती बनी, लेकिन उन्होंने वेटलिफ्टिंग छोड़ने के बजाय अपनी मेहनत जारी रखी।

लकड़ियां उठाते हुए दिखी थी ताकत

मीराबाई चानू के वेटलिफ्टर बनने की कहानी भी दिलचस्प है। बचपन में वह अपने परिवार की मदद के लिए लकड़ियां इकट्ठा करने जाया करती थीं। बताया जाता है कि कम उम्र में ही वह भारी वजन आसानी से उठा लेती थीं। उनकी शारीरिक ताकत ने आगे चलकर वेटलिफ्टिंग की दुनिया में कदम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शुरुआती दौर में आधुनिक प्रशिक्षण उपकरण उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्होंने सीमित संसाधनों के साथ अभ्यास किया। बाद में उनकी प्रतिभा को सही दिशा मिली और उन्होंने प्रोफेशनल वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग शुरू की।

ट्रेनिंग सेंटर पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं

मीराबाई के गांव से इम्फाल स्थित खुमान लम्पक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण रोजाना आने-जाने का खर्च भी परिवार के लिए अतिरिक्त बोझ था।

ऐसे समय में रास्ते से गुजरने वाले ट्रक चालकों ने उनकी मदद की। मीराबाई कई बार ट्रकों में लिफ्ट लेकर ट्रेनिंग के लिए जाती थीं। तमाम परेशानियों के बावजूद उनका अभ्यास जारी रहा और धीरे-धीरे उनकी मेहनत का असर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दिखाई देने लगा।

दुनिया ने देखा मीराबाई का दम

लगातार अभ्यास के बाद मीराबाई चानू भारतीय वेटलिफ्टिंग के सबसे बड़े नामों में शामिल हो गईं। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स, विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक जैसे बड़े मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और कई उपलब्धियां अपने नाम कीं।

टोक्यो ओलंपिक में मीराबाई चानू ने महिलाओं के 49 किलोग्राम भार वर्ग में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा था। उनकी इस उपलब्धि ने उन्हें देशभर में नई पहचान दिलाई।

कॉमनवेल्थ गेम्स में भी मीराबाई का प्रदर्शन शानदार रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उनके प्रदर्शन ने साबित किया कि संसाधनों की कमी के बावजूद मजबूत इरादे और लगातार मेहनत किसी खिलाड़ी को दुनिया के शीर्ष स्तर तक पहुंचा सकती है।

मदद करने वाले ट्रक ड्राइवरों को नहीं भूलीं मीराबाई

सफलता हासिल करने के बाद भी मीराबाई उन लोगों को नहीं भूलीं, जिन्होंने मुश्किल दौर में उनकी मदद की थी। ट्रेनिंग के लिए आने-जाने में मदद करने वाले ट्रक चालकों के प्रति उन्होंने सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया और उनका सम्मान भी किया।

उनका यह कदम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि उन्होंने अपनी सफलता में उन लोगों के योगदान को याद रखा, जिन्होंने उस समय उनका साथ दिया था जब उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे।

पद्म श्री और खेल रत्न से हो चुकी हैं सम्मानित

भारतीय खेलों में शानदार योगदान के लिए मीराबाई चानू को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री और देश के सर्वोच्च खेल सम्मान मेजर ध्यानचंद खेल रत्न से सम्मानित किया है।

खेल के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें मणिपुर पुलिस में भी जिम्मेदारी दी गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली सफलताओं ने उन्हें भारतीय वेटलिफ्टिंग के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल कर दिया।

संघर्ष से सफलता तक का प्रेरणादायक सफर

एक छोटे से गांव और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से निकलकर दुनिया के बड़े खेल मंचों पर तिरंगा लहराने तक मीराबाई चानू का सफर आसान नहीं रहा। संसाधनों की कमी, लंबी दूरी तय कर ट्रेनिंग करना और आर्थिक परेशानियां उनके रास्ते में आईं, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया।

मीराबाई की कहानी बताती है कि प्रतिभा को जब मेहनत, अनुशासन और सही अवसर मिलता है तो कठिन परिस्थितियों से निकलकर भी दुनिया के सबसे बड़े मंच तक पहुंचा जा सकता है। यही वजह है कि आज उनकी कहानी देश के लाखों युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।

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