नई दिल्ली। Project Kusha: भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने गुरुवार, 23 जुलाई 2026 को ओडिशा तट स्थित एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से ‘कुशा’ लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम का पहला सफल फ्लाइट टेस्ट किया। दावा है कि यह एयर डिफेंस सिस्टम करीब 400 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद हवाई खतरों को इंटरसेप्ट करने में सक्षम होगा। अपनी क्षमताओं के कारण इसे भारत का स्वदेशी ‘S-400’ भी कहा जा रहा है।


परीक्षण के दौरान मिसाइल को एक इलेक्ट्रॉनिक टारगेट के खिलाफ दागा गया, जिसे तेज रफ्तार और अधिक ऊंचाई वाले हवाई खतरे की तरह तैयार किया गया था। मिसाइल सिस्टम ने लक्ष्य को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया।
फाइटर जेट से लेकर मिसाइल और ड्रोन तक होंगे निशाने पर

‘कुशा’ को भारत की लंबी दूरी की एयर डिफेंस क्षमता मजबूत करने के लिए विकसित किया जा रहा है। यह सिस्टम फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और UAV समेत अलग-अलग प्रकार के हवाई खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है।
मिसाइल, रडार और कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम समेत इसके विभिन्न हिस्सों को DRDO की प्रयोगशालाओं और भारतीय इंडस्ट्री पार्टनर्स के सहयोग से विकसित किया जा रहा है।
क्यों कहा जा रहा भारत का स्वदेशी S-400?
रूस के S-400 ट्रायम्फ की तरह ‘कुशा’ भी लंबी दूरी पर दुश्मन के हवाई खतरों का पता लगाकर उन्हें इंटरसेप्ट करने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है। इसे भारत के भविष्य के प्रमुख स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम के रूप में देखा जा रहा है।
तीन अलग-अलग रेंज के इंटरसेप्टर

कुशा एयर डिफेंस सिस्टम में अलग-अलग दूरी के लक्ष्यों से निपटने के लिए तीन प्रकार के इंटरसेप्टर प्रस्तावित हैं। M-1 की रेंज करीब 150 किलोमीटर, M-2 की करीब 250 किलोमीटर और M-3 की अधिकतम रेंज लगभग 350 से 400 किलोमीटर तक बताई जा रही है।
इन मिसाइलों की रफ्तार करीब मैक 5.5 तक पहुंचने की बात कही गई है। सटीक निशाना लगाने के लिए सिस्टम में आधुनिक रडार और सीकर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है।
राजनाथ सिंह ने बताया अहम उपलब्धि
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘कुशा’ के सफल परीक्षण को भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने DRDO और इससे जुड़े वैज्ञानिकों तथा इंडस्ट्री पार्टनर्स को बधाई दी। यह स्वदेशी प्रणाली भविष्य में भारत की एयर डिफेंस क्षमता को मजबूत करने के साथ विदेशी सिस्टम पर निर्भरता कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।






