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जन्म से नेत्रहीन बेटे और 80 वर्षीय मां की बदहाली पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हस्तक्षेप, ओडिशा सरकार से मांगा जवाब, तत्काल राहत देने के निर्देश

By NS
On: June 17, 2026 1:58 PM
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Supreme Court: ओडिशा में घोर गरीबी और बदहाल परिस्थितियों में जीवन बिता रहे जन्म से नेत्रहीन जापा भुए और उनकी 80 वर्षीय मां राधिका भुए के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय संवेदनशीलता दिखाते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। शीर्ष अदालत ने ओडिशा सरकार को नोटिस जारी कर मां-बेटे को तत्काल सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने और उनकी स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।

विस्तृत खबर:

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देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि संविधान केवल अधिकारों की बात नहीं करता, बल्कि हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने की भी गारंटी देता है। ओडिशा के रहने वाले जन्म से दृष्टिहीन जापा भुए और उनकी 80 वर्षीय मां राधिका भुए की गरीबी, असुरक्षित जीवन और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जुड़ी खबरों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत की चिंता सिर्फ यह जानने तक सीमित नहीं है कि सरकार ने कौन-कौन सी योजनाएं शुरू की हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उन योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं।

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सरकार ने क्या जानकारी दी?

सुनवाई के दौरान ओडिशा सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि राधिका भुए को सरकारी आवास योजना के तहत घर आवंटित किया जा चुका है। इसके अलावा उनके दो अन्य बेटों को भी अलग-अलग आवास उपलब्ध कराए गए हैं।

सरकार ने यह भी कहा कि राधिका भुए को हर महीने 3,500 रुपये वृद्धावस्था पेंशन दी जा रही है, जबकि जापा भुए को 3,500 रुपये दिव्यांग पेंशन मिल रही है। इसके अलावा दोनों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मुफ्त चावल और अन्य सरकारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दावों पर संतोष व्यक्त करने के बजाय यह जानना जरूरी समझा कि क्या वास्तव में मां-बेटे तक इन सुविधाओं का पूरा लाभ पहुंच रहा है और क्या वे सम्मानजनक जीवन जी पा रहे हैं।

पेंशन और सामाजिक सुरक्षा लाभों का मांगा पूरा ब्यौरा

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव से नीचे के स्तर के किसी वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से शपथपत्र दाखिल कर बताया जाए कि जापा भुए और उनकी मां को मिलने वाली सभी पेंशन राशि, बकाया भुगतान और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ पूरी तरह जारी किए गए हैं या नहीं।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल कागजों पर लाभ दिखाना पर्याप्त नहीं है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लाभार्थियों को वास्तव में योजनाओं का फायदा मिल रहा हो।

परिवार की स्थिति का होगा जमीनी आकलन

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (SLSA) को निर्देश दिया कि वह तत्काल परिवार से संपर्क कर उनकी वास्तविक स्थिति का आकलन करे। अदालत ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौजूद राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव अरबिंदो पटनायक को निर्देश दिया कि संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव स्वयं परिवार से मुलाकात करें और उनकी समस्याओं की जानकारी लें।

अदालत ने कहा कि जापा भुए और उनकी बुजुर्ग मां की वर्तमान जीवन परिस्थितियों की रिपोर्ट तैयार कर जल्द कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करने के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जापा भुए या उनकी मां को किसी प्रकार की चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है तो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और मुख्य चिकित्सा अधिकारी मिलकर तुरंत आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित करें।

कोर्ट ने कहा कि वृद्धावस्था और दिव्यांगता की स्थिति में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहद महत्वपूर्ण है और इसमें किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

क्या जापा भुए को मिल सकता है अलग घर?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि जन्म से नेत्रहीन जापा भुए स्वयं एक अलग आवास इकाई प्राप्त करने के पात्र हो सकते हैं।

अदालत ने राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह इस पहलू की विशेष जांच करे। यदि जांच में यह पाया जाता है कि जापा भुए किसी सरकारी आवास योजना के तहत अलग घर पाने के पात्र हैं, तो राज्य सरकार को उन्हें उचित राहत देने की सिफारिश की जाए।

दिव्यांगों के अधिकारों के लिए करेंगे जागरूकता अभियान

मामले में एक सकारात्मक पहल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जापा भुए को पैरा-लीगल वॉलंटियर के रूप में नियुक्त करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि वे अपने क्षेत्र में अन्य दिव्यांग व्यक्तियों को उनके कानूनी अधिकारों, सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा लाभों के बारे में जागरूक करने का कार्य करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस जिम्मेदारी के लिए उन्हें नियमित मानदेय दिया जाएगा और यह राशि ओडिशा सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए।

मानवीय गरिमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की सफलता केवल योजनाएं बनाने में नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर और वंचित वर्ग तक उन योजनाओं का लाभ पहुंचाने में है। अदालत ने कहा कि हर नागरिक को सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है और सरकार का दायित्व है कि वह इस अधिकार की रक्षा करे।

13 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई तय की है। तब तक ओडिशा सरकार को मां-बेटे की सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, पेंशन भुगतान, आवास सुविधा और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभों से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।



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