बहुसंख्यकवाद से जुड़ा है पूर्वोत्तर के लोगों से पूर्वाग्रह

NFA@0298
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मैंने 2026 में लिखने की शुरुआत 24 बरस के स्टुडेंट अंजेल चकमा पर देहरादून में हुए नस्लीय हमले के बारे में लिख कर की थी। 17 दिन बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। इस घटना ने स्मरण कराया था कि भारत में किया गया विविधता का दावा कितना नाजुक है।

कई अखबारों ने रिपोर्ट किया था कि अंजेल ने कहा था, मैं एक भारतीय हूं, मैं और आपको क्या प्रमाणपत्र दिखाऊं? यह उसके आखिरी शब्द थे। उसकी मौत ने करीब एक दशक पहले दिल्ली के लाजपत नगर में हुई एक अन्य स्टुडेंट निडो तानिया की बर्बर हत्या की याद दिला दी थी। भीड़भाड़ वाले लाजपत नगर के दुकानदारों ने उसके रंग-रूप पहनावे और उसकी हेयर स्टाइल का मजाक उड़ाया और फिर उसे पीट कर मार डाला था। 

भारत की विविधता की अक्सर दुहाई दी जाती है। स्कूलों में बच्चों से कहा जाता है कि वे विविधता का जश्न मनाएं। फिर भी, अक्सर सड़कों पर विविधता पर हमले किए जाते हैं। अंजेल की हत्या कोई अपवाद नहीं थी। उसके भाई द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के मुताबिक नशे में धुत लोगों ने उन पर नस्लीय टिप्पणियां की और चाकू से हमला किया था।

शुरुआत में पुलिस ने नस्लीय हमले से इनकार किया और जब परिवार और जागरूक लोगों ने दबाव बनाया तब जाकर उसने नस्लीय गालियों की बात मानी और आखिरकार पांच लोगों को गिरफ्तार किया। हालांकि एक हमलावर भागने में सफल रहा।

यह जाती हुई फरवरी है। बासंती हवा बह रही है। चारों ओर फूल खिले हुए हैं। लेकिन मुझे फिर उसी अप्रिय विषय पर लिखने को मजूबर होना पड़ रहा है। हाल ही में दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में एक मामूली विवाद को लेकर अपने ही देश के नागरिकों के प्रति नस्लीय नफरत की हद तक ‘दूसरा’  वाला व्यवहार देखा गया।

अरुणाचल प्रदेश की तीन युवा महिलाएं एक किराए के घर पर रहती है। वे अपने एयर-कंडीशनर की मरम्मत करवा रही थीं, जिससे उड़ने वाली धूल औऱ कचरा उनके पड़ोसियों रूबी जैन और हर्ष जैन को नागवार गुजरा। इन दोनों ने उन पर नस्लीय और इन युवतियों की पूर्वोत्तर से जुड़ी पहचान को लेकर बेहद अपमानजक टिप्पणियां कीं, उन्हें धमकाया- डराया।

दिल्ली पुलिस ने इस विवाद का वीडियो वायरल होने के बाद 25 फरवरी को जैन दंपत्ति को गिरफ्तार कर लिया। रूबी और हर्ष जैन को 14 दिन की न्यायिक हिरासत कानून की कामयाबी कही जा सकती है, लेकिन यह घटना भारत में नस्लीय पूर्वाग्रह का आइना बनकर सामने आई है।

इस विवाद से जुड़े वायरल वीडियो में ढेर सारे नस्लीय शब्द सुने जा सकते हैं, जिनमें ‘मोमो’, ‘इलिट्रेट’ और ‘सेक्स वर्कर’ जैसे शब्द भी शामिल हैं। सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इस फुटेज में एक पुलिसवाला भी नजर आता है।

इस घटना ने देश की राजधानी में रहने वाले पूर्वोत्तर के समुदाय, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और संवेदनशील लोगों में गुस्सा भड़का दिया। वे इस बात पर नाराज थे कि जब उन महिलाओं का उत्पीड़न हो रहा था, वहां मौजूद पुलिसवाले ने चुप्पी साध रखी थी।

इस क्लिप के वायरल होने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई। राजनीतिक वर्ग के तमाम लोगों ने इस घटना की निंदा की। अरुणाचल प्रदेश से आने वाले केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के कार्यालय ने कहा कि घटना के दिन से वह पीड़ितों के संपर्क में हैं और जोर देकर कहा कि इस मामले में कठोर कार्रवाई की जाएगी ताकि सबक सिखाया जा सके। 

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस व्यवहार को पूरी तरह से अस्वीकार्य करार दिया। वह सीधे दिल्ली पुलिस कमिश्नर के संपर्क में हैं, ताकि इस मामले को आम घटना मानकर टाला न जा सके। 

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा, दिल्ली सबकी है। उन्होंने पीड़ितों से मुलाकात कर उनकी सुरक्षा का वादा किया। मेघालय के मुख्यमंत्री कोनार्ड संगमा ने इस घटना को शर्मनाक बताया और चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं को सनसनीखेज सुर्खियां बनाकर किसी अगली घटना के होने तक भुला न दिया जाए। सिक्किम के सांसद इंद्र हांग सुब्बा ने दिल्ली पुलिस को 23 फरवरी को पत्र लिखकर इस घटना को संवैधानिक मूल्यों का घनघोर उल्लंघन करार दिया। उन्होंने इसे नस्लीय भेदभाव और ‘सांस्कृतिक हमला’ करार दिया।

प्रद्युत मानिक्य देबबर्मा औ गौरव गोगोई जैसे  नेताओं ने भी इस घटना की निंदा की और जोर देकर कहा कि पूर्वोत्तर के लोगों की राष्ट्रभक्ति को देश की राजधानी में मजाक नहीं बनाना चाहिए।

यह तो पूरी कहानी है, जो मीडिया में देखी सुनी जा रही है। लेकिन इसके पीछे की कहानी क्या है?

दक्षिण दिल्ली के हुमायूंपुर इलाके में घूमते हुए मुझे इसका कुछ जवाब मिला। यहां मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के लोग किराने की खरीदारी करते हैं, अपने घर के व्यंजन का मजा लेते और अमूमन दिल्ली में इसी इलाके में किराए पर रहना पसंद करते हैं। यह इलाका दिल्ली में एक छोटा-सा नार्थ-ईस्ट है।

उत्तर-पूर्व के लोग एकसमान समुदाय नहीं हैं— हुमायूंपुर में रहने वाले अलग-अलग राज्यों से हैं, जिनकी अपनी अलग परंपराएं और इतिहास हैं। फिर भी, उनकी बड़ी संख्या के कारण यहाँ एक मजबूत समुदाय की भावना और सुरक्षा का एहसास होता है। इस इलाके के ज्यादातर मकान मालिक जाट हैं।

दो दिन पहले शाम को मैं हुमायूंपुर के एक अपने पसंदीदा मणिपुरी रेस्तरां में ब्लैक राइस पुडिंग (चाक हाउ खीर) खाने के लिए रुकी। वहां मौजूद दूसरे ग्राहकों से बात करना आँखें खोल देने वाला अनुभव साबित हुआ।

मणिपुर के एक युवा ने कहाः “मालवीय नगर वाली घटना सिर्फ नस्लीय भेदभाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे बहुत कुछ और है। यह देश में हमेशा चलने वाली बात है — बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यकों पर हमला करते हैं। जो लोग बहुसंख्यक लोगों से अलग दिखते हैं, अलग खाते हैं, अलग बोलते हैं, अलग रहते हैं — उन्हीं को निशाना बनाया जाता है।”

फिर उसने कहा, पीड़ित हमारी तरह पूर्वोत्तर के हो सकते हैं, लेकिन यह केवल हमारी बात नहीं है। जो कोई भी अल्पसंख्यक है और कमजोर दिखता है, वह निशाने पर है। यहां हुमायूंपुर में स्थानीय जाट और पूर्वोत्तर के लोग सद्भाव से रहते हैं। लेकिन यह सद्भाव सिर्फ सतह पर है। दरअसल उन्हें जोड़े रखने वाला गोंद इकोनॉमिक्स है। यहां जितनी भी दुकानें, खाने-पीने की जगहें, पार्लर, किराना स्टोर्स हैं — सब उत्तर-पूर्व के लड़के-लड़कियों के भरोसे हैं, जो यहां किराए पर रहते हैं। इनसे बहुत पैसा आता है। अगर हम सब डर कर यहां से चले गए, तो इनका धंधा चौपट हो जाएगा। मकान मालिकों की जेब भी खाली हो जाएगी।

मैंने वहां जिन युवाओं से मुलाकात की, उन्होंने जवाबदेही की बात की। उन्होंने जो छोटी-छोटी बातों में छिपे नस्लवाद की बात की। मसलन, रोजमर्रा की गालियों में, खाने-पीने को लेकर किए जाने वाले मजाक में, और स्टिरियोटाइप वाली टिप्पणियों में। ये सब खतरनाक तरीके से सामान्य हो रहे हैं।

भारत के विभिन्न शहरों में लगातार सड़कों पर विविधता को कुचला जा रहा है। दूसरी ओर पाठ्य पुस्तकों में विविधता को सराहा जाता है।

रूबी जैन और उनके पति ने एक पुलिसवाले की मौजूदगी में अरुणाचल की तीन युवा महिलाओं को नस्लीय गालियां दे रहे थे। राजनीतिक वर्ग की प्रतिक्रिया तभी सामने आई जब इस घटना का वीडियो वायरल हो गया था और इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता था। उनके खिलाफ इस्तेमाल किए गए शब्द केवल अपमानजनक ही नहीं थे, इनके जरिये पीड़ितों के नागरिक के रूप में सम्मान को चोट पहुंचाई गई।

निस्संदेह यह हिंसा मौखिक थी। यानी जुबानी जंग। लेकिन ऐसा नहीं है कि जो शब्द कहे गए वह सिर्फ गुस्से में आकर कहे गए थे। गुस्से ने तो पहले से मौजूद पूर्वाग्रह को उजागर ही किया। गुस्सा से नस्लवाद पैदा नहीं होता है, बल्कि गुस्सा पहले से मौजूद नस्लवाद की परतें उघाड़ देता है। दरअसल भारतीयता को कई लोग बेहद संकीर्ण तरीके से देखते हैं।

हम देख रहे हैं कि पूर्वाग्रहों को भड़काया जा रहा है।

‘सांस्कृतिक गर्व’ को हथियार बनाकर यह तय किया जा रहा है कि कौन “यहां का” है और कौन नहीं। इसकी वजह से उत्तर-पूर्व की महिलाओं को बहुत ज़्यादा ‘कामुक’ बताकर अपमानित किया जाता है।

पूर्वोत्तर के समुदाय की यह हकीकत है कि उन्हें हमेशा सतर्कता के साथ रहन  पड़ता है। अगर हम ‘एकता’ को ‘एकरूपता’ समझते रहेंगे और भारतीय पहचान में सब एक जैसे हैं, इस मिथक को सच मानते रहेंगे तो कुछ भी नहीं बदलेगा।  

हुमायूंपुर जैसे इलाकों में जो थोड़ी-बहुत शांति दिखती है, वह असल में विविधता को सचमुच स्वीकार करने या उसके एहसास के कारण नहीं है।

यह सिर्फ़ पैसों की वजह से है — मकान मालिक और दुकानदारों का उनके प्रति व्यवहार उनसे होने वाली उनकी कमाई की वजह से है। इसलिए नहीं कि उनके मन से पूर्वाग्रह खत्म हो गए हैं।

जब तक हम पड़ोस के छोटे-मोटे झगड़ों के पीछे छिपे गहरे पूर्वाग्रह का सामना नहीं करेंगे, तब तक दिल्ली और भारत के बाकी शहर ऐसे ही रहेंगे, जहां कुछ नागरिकों को हमेशा लगता रहेगा कि वे अपने ही देश में मेहमान हैं।



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