
काशी। DHARMA NEWS: भगवान भोलेनाथ की नगरी काशी का मणिकर्णिका घाट न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी अद्भुत आध्यात्मिक पहचान के लिए जाना जाता है। इसे महाश्मशान कहा जाता है—वह स्थान जहां चिता की अग्नि कभी ठंडी नहीं होती और जहां मृत्यु को भी मोक्ष का द्वार माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार औघड़ रूप में भगवान शिव स्वयं यहां विराजते हैं और अंतिम समय में प्राणी को तारने का कार्य करते हैं। ग्रंथों में मणिकर्णिका घाट को अनादि काल से मौजूद बताया गया है, जहां सदियों से दाह संस्कार की परंपरा अनवरत चली आ रही है।

जब गंगा नहीं थीं, तब भी था मणिकर्णिका

मान्यता है कि जब भगवान शिव ने मणिकर्णिका घाट को अपने निवास स्थान के रूप में बसाया था, तब यहां गंगा नदी का प्रवाह नहीं था, बल्कि एक पवित्र कुंड हुआ करता था। कथा के अनुसार स्नान करते समय भगवान शिव के कान का कुंडल (मणि कर्णिका) उस कुंड में गिर गया, और तभी से इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ गया। चूंकि यहां स्वयं महादेव का वास माना जाता है, इसलिए इस घाट पर मृत्यु को भी मंगलकारी माना जाता है और विश्वास है कि यहां दाह संस्कार होने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सदियों पुराना घाट, अब नए स्वरूप में

सैकड़ों वर्षों से मणिकर्णिका घाट पर निरंतर चिताएं जलती आ रही हैं। समय के साथ घाट का स्वरूप जरूर बदला, लेकिन इसकी आस्था और परंपरा अटूट रही। अब एक बार फिर इतिहास बनने जा रहा है, क्योंकि मणिकर्णिका महाश्मशान घाट के पुनर्विकास का कार्य शुरू हो चुका है। यह कार्य सीएसआर फंड से लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत से कराया जा रहा है, जिसकी देखरेख नगर निगम कर रहा है और एक कार्यदायी संस्था द्वारा इसे क्रियान्वित किया जा रहा है।
29 हजार वर्गमीटर में होगा व्यापक पुनर्निर्माण

मणिकर्णिका घाट के पुनर्निर्माण का काम करीब 29 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में किया जा रहा है। चूंकि यहां की मिट्टी दलदली है, इसलिए बाढ़ और कटाव से बचाव के लिए पहले 15 से 20 मीटर नीचे तक पाइलिंग कराई गई है। इसके बाद पुराने पक्के घाटों के पत्थरों को तोड़कर बड़ी नावों की मदद से गंगा पार भेजा जा रहा है, ताकि निर्माण कार्य सुरक्षित तरीके से पूरा किया जा सके।
मॉनसून की समस्या होगी खत्म

हर साल मॉनसून में पूरा घाट जलमग्न हो जाता था, जिससे अंतिम संस्कार और श्रद्धालुओं को भारी परेशानी होती थी। पुनर्निर्माण के बाद यह समस्या दूर हो जाएगी। गंगा के अधिकतम जलस्तर से ऊपर दो स्तरों के प्लेटफॉर्म बनाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार निचले स्तर पर 18 और ऊपरी स्तर पर 19 प्लेटफॉर्म होंगे, ताकि किसी भी मौसम में दाह संस्कार निर्बाध रूप से हो सके।
चिता की राख और धुएं के लिए विशेष इंतजाम
महाश्मशान होने के कारण यहां उठने वाला धुआं और राख आसपास के घरों में जाने से लोगों को परेशानी होती थी। इसे ध्यान में रखते हुए घाट पर 25 मीटर ऊंची चिमनी लगाई जाएगी, जिससे चिता का धुआं और राख ऊपर की ओर फैल जाए और आसपास के घरों में न पहुंचे। दाह संस्कार क्षेत्र में वेटिंग एरिया और चेंजिंग रूम का भी निर्माण किया जा रहा है, ताकि परिजनों को सुविधा मिल सके।
अंतिम संस्कार से जुड़े हर संस्कार के लिए अलग व्यवस्था
पुनर्निर्माण के बाद मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार से जुड़े हर रिवाज के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं होंगी। शव स्नान के लिए विशेष जलकुंड बनाया जा रहा है, वहीं मुंडन संस्कार के लिए अलग क्षेत्र निर्धारित किया जाएगा। इसके साथ ही लकड़ी भंडारण क्षेत्र का निर्माण होगा और घाट परिसर में दो सामुदायिक शौचालय भी बनाए जाएंगे। पूरे निर्माण में चुनार और जयपुर के पत्थरों का उपयोग किया जा रहा है, ताकि घाट की ऐतिहासिक और धार्मिक गरिमा बनी रहे।
आस्था और आधुनिकता का संगम
मणिकर्णिका घाट का यह पुनर्विकास आस्था और आधुनिक सुविधाओं का अनोखा संगम होगा। जहां एक ओर सदियों पुरानी परंपराएं और मान्यताएं सुरक्षित रहेंगी, वहीं दूसरी ओर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों को बेहतर, सुरक्षित और स्वच्छ सुविधाएं मिलेंगी। काशी का यह महाश्मशान घाट अब अपने पौराणिक गौरव के साथ नए युग में प्रवेश करने जा रहा है, जहां मृत्यु भी मोक्ष का उत्सव बन जाती है।


