
मनोज झा, राज्यसभा सदस्य
‘विश्ववंदित गणराज्य’ के विदेश मंत्रालय में इन दिनों असामान्य हलचल है। वजह कोई युद्ध नहीं, न किसी देश ने व्यापार समझौता तोड़ा है, और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई कूटनीतिक संकट पैदा हुआ है। असली संकट उससे कहीं अधिक संवेदनशील और भयावह माना जा रहा है कि ‘महामानव’ की विदेश यात्राओं के दौरान ‘अनियंत्रित प्रश्नों’ की संभावनाओं का प्रबंधन।
मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, एक समय था जब कूटनीति अपेक्षाकृत सरल हुआ करती थी। तब विदेश सेवा का अर्थ था, राष्ट्रों के बीच विश्वास बनाना, व्यापारिक समझौते करना, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना, सीमा पर तनावों को संतुलित करना और संकट में फंसे भारतीयों को सुरक्षित वापस लाना। काम कठिन था, पर उसमें गरिमा थी; तनाव था, पर उद्देश्य राष्ट्रहित था।
लेकिन समय बदल चुका था। अब कूटनीति का दायरा केवल देशों तक सीमित नहीं रहा। अब उसमें “छवि-सुरक्षा” का नया आयाम जुड़ गया था। विदेश नीति को अनौपचारिक रूप से दो भागों में बांट दिया गया था, पहला, दुनिया के देशों से संबंध बेहतर बनाए रखना। दूसरा, दुनिया को यह विश्वास दिलाते रहना कि कोई असुविधाजनक प्रश्न वास्तव में असुविधाजनक था ही नहीं।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विदेश मंत्रालय के प्रशिक्षण संस्थान में हाल ही में एक नया पाठ्यक्रम आरंभ किया गया था जिस module का नाम था ‘उत्तर-विहीन संवाद की कला’।
इस पाठ्यक्रम में युवा अधिकारियों को सिखाया जाता था कि यदि किसी विदेशी पत्रकार ने ऐसा प्रश्न पूछ लिया जिसका उत्तर देना राजनीतिक रूप से जोखिमपूर्ण हो, तो चेहरे पर मुस्कान कैसे स्थिर रखी जाए। पहले अध्याय का शीर्षक था ‘मौन : लोकतांत्रिक आत्मविश्वास की सर्वोच्च अभिव्यक्ति।’
दूसरे अध्याय में अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता था कि प्रश्न का उत्तर दिए बिना उत्तर देने का भ्रम कैसे उत्पन्न किया जाए। उदाहरण के लिए यदि कोई पत्रकार पूछे कि ‘प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर क्या कहेंगे?’ तो आदर्श उत्तर होगा— ‘भारत वैश्विक शांति, समावेशी विकास और मानवता के साझा भविष्य के लिए प्रतिबद्ध है।’ ‘भारत ने योग के माध्यम से दुनिया को एक नयी दिशा दी है’ आदि-आदि।
यदि पत्रकार दुर्भाग्यवश पुनः वही प्रश्न पूछ दे, तो प्रशिक्षु अधिकारी को तत्काल ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ ‘औपनिवेशिक मानसिकता’, ‘भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा’, ‘सभ्यता विमर्श’ और ‘विश्वगुरु की भूमिका’ जैसे शब्दों का रणनीतिक प्रयोग करना होता था, ताकि मूल प्रश्न राष्ट्रवादी धुंध में स्वाभाविक रूप से विलीन हो जाए।
मंत्रालय के गलियारों में एक वरिष्ठ अधिकारी इन दिनों अक्सर उदास दिखाई देते थे। उन्होंने एक दिन अपने कनिष्ठ सहयोगी से कहा कि ‘बेटा, हमने विदेश सेवा इसलिए जॉइन की थी कि दुनिया में भारत का पक्ष मजबूती से रखेंगे। हमें क्या मालूम था कि एक दिन हमारा सबसे महत्वपूर्ण काम प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पत्रकारों और प्रधानमंत्री के बीच कुर्सियों की दूरी नापना होगा।’
अब विदेश यात्राओं की तैयारियां भी बदल चुकी थीं। पहले बैठकों में यह तय होता था कि किन मुद्दों पर समझौते होंगे, किन देशों से रणनीतिक साझेदारी बढ़ेगी, और किन विषयों पर संयुक्त बयान जारी होगा। अब सबसे लंबी बैठक इस प्रश्न पर होती थी कि पत्रकार कितनी दूर बैठेंगे, कितने सवाल लिए जाएंगे, और सबसे महत्वपूर्ण कि ‘क्या प्रश्न पूछने की संभावना को शिष्टतापूर्वक समाप्त किया जा सकता है?’
सूत्रों के अनुसार मंत्रालय में हाल ही में एक नई इकाई भी गठित की गई है ‘जोखिम मूल्यांकन प्रकोष्ठ।’ इस प्रकोष्ठ का मुख्य कार्य संभावित पत्रकारों की सूची बनाना और यह अनुमान लगाना है कि कौन पत्रकार लोकतंत्र को अत्यधिक गंभीरता से लेने की आदत से ग्रस्त हो सकता है। एक गोपनीय रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि ‘सबसे खतरनाक पत्रकार वे पाए गए हैं जो प्रश्न पूछने के बाद उत्तर सुनने की जिद भी करते हैं।’ रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि कुछ विदेशी पत्रकारों में ‘अनुशासनहीन जिज्ञासा’ के लक्षण पाए गए हैं। ऐसे तत्व प्रेस वार्ता के दौरान पूरक प्रश्न पूछने का दुस्साहस कर सकते हैं, जिससे सुव्यवस्थित लोकतांत्रिक वातावरण में अनावश्यक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।
इन जोखिमों के बीच विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने सामूहिक रूप से सरकार को एक ज्ञापन भी सौंपा है। ज्ञापन में निम्नलिखित विशेष सुविधाओं की माँग की गई है—
- ‘असहज क्षण प्रबंधन भत्ता’
- ‘कैमरा फ्लैश मानसिक संतुलन योजना’
- ‘प्रश्न टालो प्रोत्साहन भत्ता’
- तथा प्रत्येक विदेश यात्रा के बाद अनिवार्य ‘लोकतांत्रिक पुनर्वास अवकाश’
एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि ‘अब हमें आतंकवाद, सीमा विवाद और भू-राजनीतिक तनावों से उतना भय नहीं लगता जितना अचानक उठे किसी पत्रकार के हाथ से लगता है।’
स्थिति इतनी बदल चुकी थी कि मंत्रालय में वीरता की परिभाषा भी बदल गई थी। पहले यह साहस माना जाता था कठिन वार्ताओं में देश का पक्ष मजबूती से रखना। अब बहादुरी यह मानी जाती है कि कोई अधिकारी प्रेस कॉन्फ़्रेंस समाप्त होने के बाद भी कितना मुस्कुराता हुआ दिखाई दे।
सूत्रों के मुताबिक सरकार ने इन माँगों पर विचार के लिए एक उच्चस्तरीय समिति भी गठित कर दी है। समिति इस विषय पर गंभीर मंथन कर रही है कि क्या ‘महामानव छवि संरक्षण’ को औपचारिक रूप से विदेश नीति का ‘अभिन्न अंग’ घोषित कर दिया जाए। समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘जब राष्ट्र और व्यक्ति की छवि एकाकार हो जाए, तब कूटनीति और जनसंपर्क के बीच की रेखा का धुंधला हो जाना स्वाभाविक ऐतिहासिक प्रक्रिया है।’
हालांकि मंत्रालय के कुछ पुराने अधिकारी अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद कभी वह दौर लौटेगा जब विदेश यात्राओं की सबसे बड़ी चिंता यह होती थी कि समझौता सफल होगा या नहीं न कि यह कि कहीं कोई पत्रकार सचमुच प्रश्न पूछने की भूल तो नहीं कर बैठेगा।
तब तक विदेश मंत्रालय अपने नए दायित्वों के साथ पूरी निष्ठा से लगा हुआ है, दुनिया को यह समझाने में कि लोकतंत्र में संवाद आवश्यक है, बशर्ते संवाद केवल ‘एक दिशा’ में प्रवाहित हो।
जय हिन्द।
(राजद के राज्यसभा सदस्य मनोज झा के एक्स अकाउंट से साभार)
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