लाभार्थी ही नहीं, उन्हें इस देश का नागरिक भी समझिए !

NFA@0298
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छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट इलाके से एक बेहद मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है, जहां एक अधेड़ महिला अपनी करीब 90 साल की सास को पीठ पर लादकर पेंशन की राशि निकालने के लिए करीब नौ किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंचने को मजबूर हुई।

सरकार की योजना के मुताबिक उस बुजुर्ग महिला सोमारी को हर महीने पेंशन के रूप में पांच सौ रुपये मिलते हैं। मैनपाट के जिस गांव कुनारी में वह रहती हैं, वहां से ब्लाक मुख्यालय के रास्ते पर पड़ने वाले नाले की वजह से वहां तक पैदल आना पड़ता है। दरअसल पिछले कई महीने से बैंक मित्र के न आने के कारण सोमारी की बहु सुखमुनिया को उन्हें पीठ पर लादकर इस भीषण गरमी में पैदल चलकर मुख्यालय तक आना पड़ा।

बात सिर्फ मैनपाट की नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही ओडिशा के क्योंझर से ऐसी ही रुला देने वाली तस्वीर सामने आई थी, जब 52 बरस के जीतू मुंडा कब्र से अपनी बहन का कंकाल निकाल कर उसे लादे हुए बैंक पहुंचे थे, क्योंकि बैंक के कारिंदों को भरोसा नहीं हो रहा था कि उनकी बहन की मौत हो चुकी है। और मामला उनकी बहन के खाते में जमा 19,300 रुपये से जुड़ा था।

बस्तर में बीमार परिजनों को कंधों पर या खाट पर लिटाकर मीलों पैदल चलकर आते आदिवासियों की तस्वीरें भी देखी ही जा सकती हैं।

मैनपाट के बैंक के मैनेजर ने सफाई दी है कि बैंक मित्र की व्यवस्था है, जो कि घर तक पहुंचकर पेंशन पहुंचाते हैं। यह सफाई जाहिर है, एक खानापूर्ति ही है। दरअसल यह मामला केवाईसी से भी जुड़ा है, जिस पर सचमुच अलग से बात किए जाने की जरूरत है कि आखिर यह कौन-सा सिस्टम है, जिसने देश के नागरिकों को संदिग्ध बना दिया है।

ऐसी सारी घटनाएं देश में आम नागरिकों के घटते महत्व को ही दर्शाती हैं। ध्यान रहे, यह सब अमृतकाल में हो रहा है, जिसकी दुंदुभी चहुंओर बजाई जा रही है।

मैनपाट या क्योंझर की घटनाओं का आपस में सीधा संबंध भले न हो, लेकिन यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तेजी से हो रहे क्षरण को दिखाती हैं। ये दिखाती हैं कि नागरिकों खासकर, वंचित और बेबस लोगों की हैसियत इस व्यवस्था में वोट डालने से अधिक नहीं है। वे उस निर्णय लेने की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सा नहीं हैं, जिसने देश में उन्हें लाभार्थी बना दिया है। वे इस लोकतंत्र में बराबर के साझेदार नहीं रहे, क्योंकि व्यवस्था इन लाभार्थियों को याचक के तौर पर देखती है। जाहिर है, याचक के पास बराबरी का दर्जा नहीं है। इस व्यवस्था में वह उसे मिलने वाले लाभ के लिए याचना ही कर सकता है। यह व्यवस्था बदलनी चाहिए, ताकि फिर किस सुखमुनिया को अपनी सास को पीठ पर लादकर बैंक तक न जाना पड़े।



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