
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Netherlands दौरे के दौरान पत्रकारों के सवाल पर भारतीय डिप्लोमेट इस कदर आगबबूला हो गए कि उन्होंने भारतीय विविधता का उदाहरण देते हुए पत्रकारों की कथित नासमझी पर हमला बोल दिया। वहीं नॉर्वे में एक पत्रकार ने PM मोदी से पूछ लिया कि आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र मीडिया से सवाल क्यों नहीं लेते?
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों विदेश दौरे पर हैं और विभिन्न देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने को लेकर बैठकें कर रहे हैं।
इससे पहले डच प्रधानमंत्री ने पूर्व में कहा था कि भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकार ‘गंभीर दबाव’ में हैं।
डच प्रधानमंत्री रोब जेटन ने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों के क्षरण पर चिंता व्यक्त की थी जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने सप्ताहांत बैठक से पहले की गई थी।
जब भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज से द हेग में रविवार को प्रेस ब्रीफिंग के दौरान डच प्रधानमंत्री की टिप्पणियों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि ऐसे सवाल भारत के इतिहास की ‘असमझ’ से उपजते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री की टिप्पणियां नहीं देखी हैं और केवल भारत में प्रेस तथा अल्पसंख्यक स्वतंत्रता के व्यापक सवाल का जवाब दे रहे हैं।
प्रेस कांफ्रेंस की जगह प्रेस स्टेटमेंट
पीएम मोदी जिन्होंने शनिवार को नीदरलैंड्स की दो दिवसीय यात्रा के साथ अपने चार देशों के यूरोपीय दौरे की शुरुआत की ने भारत-नीदरलैंड संबंधों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया। दोनों नेताओं ने साझा प्रेस स्टेटमेंट जारी किया लेकिन कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं हुई।
De Volkskrant अखबार के अनुसार यह विवाद मोदी के साथ बैठक से बहुत पहले तब शुरू हुआ जब नीदरलैंड के पीएम जेटन पहले प्रेस से बात कर रहे थे, जब उनसे भारत में प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों की स्थिति पर चिंताओं के बारे में पूछा गया।
डच पीएम ने कहा, ‘यह सिर्फ प्रेस स्वतंत्रता की बात नहीं है, बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की भी, जो गंभीर दबाव में हैं। यह मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय पर लागू होता है, लेकिन कई अन्य छोटे समुदायों पर भी।
उन्होंने कहा, ‘चिंता इस बात को लेकर है कि भारत किस हद तक एक समावेशी समाज बना रहता है, जहां हर किसी को समान अधिकार मिलते हैं।’ जेटन के अनुसार, भारतीय सरकार के साथ इन चिंताओं को नियमित रूप से उठाया जाता रहा है।
भारतीय राजनयिक ने कहा, ‘भारत 1.4 अरब लोगों का देश है, दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश। 5000 साल से अधिक पुरानी सभ्यता वाला देश। यह एक विविधतापूर्ण देश है।’
उन्होंने कहा, ‘संस्कृति की विविधता, भाषाओं की विविधता, भोजन की विविधता, धर्म की विविधता। हर धर्म, जब भी दुनिया के किसी हिस्से में अतीत में उत्पीड़न हुआ, वे सभी भारत आए और भारत में फले-फूले। यही भारत की सुंदरता है।यह सवाल इस बात की नासमझी के कारण आता है।’
क्या क्या तर्क दिए भारत ने?
प्रेस स्वतंत्रता के सवाल पर श्री जॉर्ज ने कहा कि भारत एक बहुत ‘शोरगुल वाला लोकतंत्र’ है क्योंकि ‘देश में हर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता प्राप्त है।’
एक लंबे जवाब में उन्होंने कहा कि भारत में यहूदियों को कभी उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा, ईसाई धर्म यीशु मसीह के पुनरुत्थान के तुरंत बाद यहां पहुंचा और इस्लाम पैगंबर मुहम्मद के जीवनकाल में आया।“हम दुनिया की कुल आबादी का छठा हिस्सा हैं, लेकिन दुनिया की समस्याओं का छठा हिस्सा नहीं। यही भारत की सुंदरता है, जो हमें गर्व का अनुभव कराती है। हर अल्पसंख्यक यहां फलता-फूलता है।’
Indian Express के अनुसार, विदेश मंत्रालय के सूत्रों का हवाला देते हुए, इस मुद्दे पर श्री जेटन और श्री मोदी के बीच बैठक में चर्चा नहीं हुई।अलग से, इंसिया हेमानी नाम की एक डच लड़की, जिसका 2016 में उसके पिता द्वारा अपहरण कर भारत लाया गया था का मामला यात्रा के दौरान उठाया गया। तब सिर्फ दो साल की बच्ची इंसिया को उसके पिता शहजाद हेमानी ने जबरन भारत ले लिया था, जबकि वह एम्स्टर्डम-ओस्ट में अपनी दादी से मिलने गई थी। एक डच अदालत ने पिता को दोषी ठहराया और आठ साल से अधिक की सजा सुनाई।
श्री जॉर्ज ने केवल इतना कहा कि ‘यह मुद्दा नीदरलैंड्स के नेतृत्व द्वारा उठाया गया था’ और अब यह सब-ज्यूडिस (अदालत में लंबित) है। ‘मैं इस पर इस चरण में टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा।’
नॉर्वे की पत्रकार ने भारतीय मीडिया की तुलना UAE, फिलिस्तीन और क्यूबा से की
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान एक विदेशी पत्रकार की टिप्पणी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है। नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका सवाल नहीं लिया, हालांकि उन्हें इसकी उम्मीद भी नहीं थी।
पत्रकार ने अपनी पोस्ट में भारत की प्रेस स्वतंत्रता को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे पहले स्थान पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर है। उन्होंने भारत की तुलना फिलिस्तीन, यूएई और क्यूबा जैसे देशों से करते हुए प्रेस की आजादी पर चिंता जताई।
पोस्ट में उन्होंने कहा, ‘हमारा काम उन ताकतों से सवाल करना है, जिनके साथ हम सहयोग करते हैं।’
इस पोस्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। एक तरफ कुछ लोग पत्रकार के बयान का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई यूजर्स इसे भारत की छवि खराब करने की कोशिश बता रहे हैं।
157 नंबर पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता
भारत 2026 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 157वें स्थान पर है (रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी), जो “बहुत गंभीर” श्रेणी में बना हुआ है। देश 2025 की रैंकिंग से छह स्थान नीचे गिरा।
आरएसएफ ने कहा कि ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ में प्रेस स्वतंत्रता संकट में है और प्रधानमंत्री मोदी तथा उनकी हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी पर पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा का आरोप लगाया। इसने भारत में बढ़ती मीडिया एकाग्रता की ओर भी इशारा किया, जिसमें मुकेश अंबानी के पास अब 70 से अधिक मीडिया आउटलेट हैं, जबकि गौतम अडानी द्वारा 2022 में एनडीटीवी के अधिग्रहण को मुख्यधारा के मीडिया में बहुलवाद के पतन के रूप में वर्णित किया गया।
अमेरिकी कमीशन ने भी लगाए हैं आरोप
इसी तरह, मानवाधिकार समूहों ने सत्तारूढ़ पार्टी की अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयानबाजी और हिंदू धार्मिक त्योहारों के आसपास सांप्रदायिक हिंसा की हालिया लहर तथा मुख्य रूप से मुस्लिम संपत्तियों के [राज्य-प्रायोजित विध्वंस] पर बार-बार चिंता जताई है।
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने कहा कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले जारी हैं क्योंकि धार्मिक स्वतंत्रता घट रही है।
इसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय अधिकारी भेदभावपूर्ण धर्मांतरण-विरोधी और गौ-हत्या विरोधी कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए कर रहे हैं। भारत ने रिपोर्ट को पक्षपाती बताते हुए खारिज कर दिया।
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