
नई दिल्ली। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद विपक्षी पार्टियों की चुनाव आयोग से नाराजगी चरम पर है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लाए गए महाभियोग के प्रस्ताव को संसद ने खारिज कर दिया। फिर दोबारा प्रस्ताव लाया गया है, लेकिन संभावना कम है कि इसको मंजूरी मिले। उधर, ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया है।
पश्चिम बंगाल में हिंसा का दौर जारी है। पांच राज्यों में नए मुख्यमंत्रियों का शपथग्रहण होना है। वहीं विपक्ष, बीजेपी और चुनाव आयोग पर साझा हमले और उसमें जनता की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए नई रणनीति बना रहा है। क्या होगी वह रणनीति यह सवाल सबके जेहन में है।
वह बोफोर्स का दौर
1989 का दौर था, जब बोफोर्स तोप सौदे में कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार के खिलाफ विपक्ष ने संसद में आवाज उठाई। लेकिन, सरकार ने विपक्ष को इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करने दी। नतीजा यह हुआ कि 63 विपक्षी सांसदों ने सरकार के विरोध में लोकसभा से सामूहिक इस्तीफा दे दिया था।
इस घटना के लगभग 37 साल बीत चुके हैं और एक बार फिर चुनाव आयोग की मनमानी, वोट चोरी और संसद के भीतर और बाहर विपक्ष आगबबूला है। इन सबके बीच संसद सदस्यों और बौद्धिक राजनैतिक गलियारों में सांसदों के सामूहिक इस्तीफे के विकल्प को लेकर भी चर्चा हो रही है।
मनोज झा ने कहा – इस्तीफा देना चाहिए

राज्यसभा सांसद और दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक मनोज कुमार झा ने बुधवार को एक कार्यक्रम में साफ शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग की मनमानी से जिस तरह के चुनाव परिणाम आ रहे हैं जैसे न्यायालय खामोश और विरोध के अवसर छीने जा रहे हैं, वैसे में संसद से अपेक्षा करना सही नहीं होगा।
सांसदों को संसद से इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि अब जरूरी मसलों का हल संसद में नहीं सड़क पर ही संभव है। जब मनोज कुमार झा यह बात कह रहे थे, उनके सामने राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा भी बैठे हुए थे।
क्या कहते हैं वामनेता?

केरल से वामपंथी सांसद पी संदोष कुमार कहते हैं कि हमें संसदीय लोकतंत्र में विश्वास रखना चाहिए। इस्तीफा देने से आम जनता की संवेदनाओं को जगाया जा सकता है, लेकिन इससे समस्या का कोई समाधान निकलेगा, इसकी उम्मीद हमें कम है।
संदोष कुमार कहते हैं कि इंदिरा गांधी, मोदी से ज्यादा निरंकुश थी, लेकिन उनकी सरकार चली गई। अब अगले साल हम सबको यूपी के विधानसभा चुनाव में जाना है। अगर आप इस्तीफा दे देंगे तो क्या वह चुनाव नहीं लड़ेंगे?
पहले भी हुए है ताबड़तोड़ इस्तीफे
ऐसा नहीं है संसद से सांसदों का इस्तीफा कोई नई बात है। मार्च 2018 में केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध जताते हुए टीडीपी के लोकसभा सांसदों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
सितंबर 2024 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने राज्यसभा की सदस्यता और राजनीति से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका और पार्टी में भ्रष्टाचार पर भी सवाल उठाए थे।
मनमोहन सिंह की सरकार में कांग्रेसी सांसदों का इस्तीफा
कांग्रेस पार्टी के सांसदों ने भी अतीत में अपने इस्तीफे दिए हैं। मनमोहन सिंह की सरकार में तो आंध्र प्रदेश के 13 सांसदों ने चाह माह के अंतराल पर ही विभिन्न मांगों को लेकर इस्तीफा दिया था।

तेलंगाना क्षेत्र के कांग्रेस सांसदों ने जनवरी 2013 में राज्य के अलग के गठन में हो रही देरी और केंद्र सरकार की अनिश्चितता के विरोध में इस्तीफा देने की पहले धमकी दी थी। फिर अपने इस्तीफे सभापति या अध्यक्ष को न सौंपकर पार्टी नेतृत्व को सौंपे थे। उनका मुख्य उद्देश्य अलग राज्य के गठन की प्रक्रिया में तेजी लाना था।
गजब तब हुआ जब कांग्रेस कार्यसमिति ने जुलाई 2013 में अलग तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूरी दी, तो इसके विरोध में सीमांध्र क्षेत्र के 7 कांग्रेस सांसदों ने अगस्त 2013 में संसद से अपने इस्तीफे सौंप दिए।इनका विरोध आंध्र प्रदेश के विभाजन के फैसले के खिलाफ था।
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