
बंगाल विधानसभा के लिए दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को है और उससे पहले 27 अप्रैल को छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं के एक दिन के विशेष सत्र बुलाए गए हैं। इन राज्यों में यह विशेष सत्र नारी शक्ति वंदन संशेाधन विधेयक पर चर्चा के लिए बुलाया है। यह उस विधेयक की बात है जो 17 अप्रैल को लोकसभा में गिर चुका है।
पिछले लगभग 12 सालों में यह पहला मौका था जब मोदी सरकार संसद में ऐसी किरकिरी हुई और विपक्ष एकजुटता के साथ सरकार के किसी विधेयक के खिलाफ खड़ा था। इस संशोधन को लेकर विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल था कि मोदी सरकार इस बहाने दरअसल लोकसभा सीटों का ऐसा परिसीमन करना चाहती है जिससे उत्तर के राज्यों की सीटें अनुपात से ज्यादा बढ़ जाएं और दक्षिण के राज्यों को नुकसान हो।
अब एक बड़ा आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एनडीए की सरकार पर यह भी लगा कि जब देश में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव चल रहे हों उसी दौरान राजनीतिक मकसद के साथ लोकसभा में यह लेकर आई।
बिल के गिरने के अगले दिन पीएम मोदी ने सरकारी न्यूज चैनल दूरदर्शन पर देश को संबोधित किया सब संबोधन भी विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस पार्टी की निंदा से भरा हुआ था। नरेंद्र मोदी उनकी पार्टी और एनडीए इस मामले को लेकर कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, सपा जैसी पार्टियों के खिलाफ नारी विरोधी होने के आरोप उछालकर एक ऐसा भावनात्मक माहौल खड़ा करना चाहती हैं, जिसमें उन्हें राजनीतिक फायदा नजर आता हो।
अगर इस राजनीति की तात्कालिकता में जाएं तो यह लाभ इन विधानसभा चुनावों में ही हो सकता था और अब यह माना जा रहा है कि इसी कोशिश की निरंतरता में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्य इस मुद्दे पर विशेष सत्र बुला रहे हैं। और दोनों की राज्यों में भाजपा सरकार ने कहा है कि इस सत्र में कांग्रेस पार्टी के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया जाएगा, यह दिलचस्प है। विधानसभाएं उस विधेयक पर चर्चा करेंगी, जिसका लेना देना लोकसभा से ही है और वह लोकसभा में गिर चुका है।
इस विधेयक पर हुई गर्मा गर्म चर्चा के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सदन में पहले ही विस्तार से जवाब दे चुके हैं सरकार का पक्ष रख चुके हैं। तो सवाल उठ रहा है कि अब छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की विधानसभा में बीजेपी के पास कहने को नया क्या है सिवाय इसके कि वो विधानसभा जैसे राज्य के सवालों प चर्चा के एक महत्वपूर्ण मंच पर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक आरोप उछाले।
क्या छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में राज्यों के अपने ऐसे मुद्दे नहीं बचे हैं जो जनता से जुड़े हों जिन पर चर्चा की जानी चाहिए। किसी दल को यह लोकतंत्रिक अधिकार है कि वह सड़क से लेकर संसद तक राजनीति करे। लेकिन यह अपने आप में क्या निरर्थक नहीं है कि ये विधानसभाएं लोकसभा में गिर चुके उस विधयेक पर चर्चा करें जो उनके दायरे से ही बाहर हो?
यह सभी जानते हैं कि इस मामले में बीजेपी के पास विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस पार्टी के खिलाफ कहने को नए मुद्दे नहीं हैं। कांग्रेस भी आमतौर पर उन्हीं आरोपों को दोहराएगी जो उसके नेता मोदी सरकार पर लगा चुके हैं। क्या संसदीय लोकतंत्र में यह कोई स्वस्थ उदाहरण दर्ज होने जा रहा है? क्या आगे भी लोकसभा में होने वाली ऐसी चर्चाओं पर देश की विधानसभाओं में इसी तरह की विशेष चर्चाएं, निंदा प्रस्ताव लाए जाते रहेंगे। यह लोकसभा में सांसदों के विशेषाधिकार से परे ऐसा मुद्दा है जो सत्तारूढ़ दल हमेशा इस सवाल के साथ मौजूद रहेगा कि क्या जनहित के सारे विषय खत्म हो गए थे।


