अवैध खनन और सत्ता का साया: क्या सिर्फ दावे ही रह गए ‘जीरो टॉलरेंस’?

NFA@0298
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बिना अनुमति परिवहन से राजस्व को भारी नुकसान….खनिज विभाग की निष्क्रियता या मिलीभगत

सतीश पारख@उतई। दुर्ग जिले के पाटन क्षेत्र में अवैध मुरूम खनन की लगातार सामने आ रही खबरें केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और राजनीतिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह हैं। परेवाडीह, महकाखुर्द और महकाकला जैसे गांवों में जिस तरह से खुलेआम मुरूम का उत्खनन और परिवहन होने के आरोप लग रहे हैं, वह यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर किसके संरक्षण में यह सब संभव हो रहा है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस पूरे मामले में एक भाजपा नेता, जो पार्षद भी है, का नाम चर्चा में आना। भले ही इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि न हुई हो, लेकिन सवाल उठना लाजिमी है कि जब सत्ताधारी दल से जुड़े जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आते हैं, तो जांच की रफ्तार अक्सर धीमी क्यों पड़ जाती है? क्या यह महज संयोग है, या फिर व्यवस्था में कहीं न कहीं दबाव और प्रभाव की परतें मौजूद हैं?
स्थानीय लोगों के अनुसार, क्षेत्र में लंबे समय से बिना अनुमति के मुरूम उत्खनन और परिवहन हो रहा है। यदि यह सच है, तो यह केवल राजस्व हानि का मामला नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था की सीधी अवहेलना है। प्रतिदिन सैकड़ों वाहनों का बिना परिवहन पास के चलना यह दर्शाता है कि निगरानी तंत्र या तो निष्क्रिय है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे हुए है।
खनिज विभाग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या विभाग को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं है, या जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई से परहेज किया जा रहा है? यदि शिकायतों के बाद भी मौके पर जांच नहीं होती, तो यह आम नागरिकों के विश्वास को कमजोर करता है और अवैध कारोबारियों के हौसले बुलंद करता है।
राज्य सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की बात जरूर करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को चुनौती देती नजर आती है। सवाल यह है कि क्या यह नीति केवल कागजों तक सीमित है, या वास्तव में इसका पालन भी हो रहा है?
इस पूरे प्रकरण में सबसे जरूरी है—निष्पक्ष और पारदर्शी जांच। अगर आरोप निराधार हैं, तो संबंधित जनप्रतिनिधि को स्पष्ट रूप से क्लीन चिट मिलनी चाहिए। और यदि आरोपों में सच्चाई है, तो फिर सख्त कार्रवाई भी उतनी ही अनिवार्य है, चाहे वह किसी भी पद या दल से जुड़ा व्यक्ति क्यों न हो।
अंततः, यह मामला सिर्फ अवैध खनन का नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ‘जीरो टॉलरेंस’ जैसे शब्द केवल नारे बनकर रह जाएंगे, और जमीन पर अवैध खनन का खेल यूं ही जारी रहेगा।



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