मजदूरी आधी, काम पूरा… G RAM G से पहले जानिए मनरेगा का हाल?

NFA@0298
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रायपुर। केंद्र की मोदी सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी कि मनरेगा की जगह  विकसित भारत G RAM G योजना शुरू कर दी। 1 जुलाई से यह योजना शुरू होगी। अभी मनरेगा के तहत मजदूरों से काम लिया जा रहा है। यानी कि अभी मनरेगा खत्म नहीं हुआ है।

मनरेगा का मकसद गांव में रोजगार और मजदूरों को आर्थिक सुरक्षा देना है। साल 2005 में इस उद्देश्य के साथ लागू किया गया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को रोजगार का कानूनी अधिकार मिले। यह दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजनाओं में से एक मानी जाती है।

लेकिन, जमीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है, क्योंकि मनरेगा की तस्वीर साफ नहीं है।

‘द लेंस’ की टीम राजधानी रायपुर से लगे आरंग ब्लॉक के चंदखुरी के पास नगपुरा गांव पहुंची। वहां बड़ी संख्या में मजदूर काम के बाद अपनी हाजिरी लगने का इंतजार कर रहे थे। इन्हीं मजदूरों से जी राम जी के शुरू होने से पहले मनरेगा के वर्तमान हालात की जानकारी ली गई।

छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत अकुशल मजदूरों की मजदूरी 261 रुपए प्रतिदिन तय है यानी कि हफ्ते में 1566 रुपए, लेकिन 6 दिन काम करने के बाद भी उन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिली। दूसरी ओर मजदूरी भुगतान में देरी की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जबकि चुनाव के दौरान हर सप्ताह मजदूरी देने का वादा किया गया था। तीसरी बड़ी समस्या ऑनलाइन अटेंडेंस की है। नेटवर्क, बायोमेट्रिक और रेटिना स्कैन की दिक्कतों के कारण कई मजदूरों की हाजिरी दर्ज नहीं हो पा रही।

‘द लेंस’ की इस ग्राउंड रिपोर्ट में देखिए मनरेगा की जमीनी हकीकत, मजदूरों की परेशानियां और वे सवाल जिनका जवाब सरकार और सिस्टम दोनों को देना होगा।

261 रुपए मजदूरी लेकिन सौ से डेढ़ सौ ही मिल रहे

मजदूरों से बातचीत में जो समस्या निकलकर सामने आई, उसमें सबसे बड़ी परेशानी मजदूरी की रकम को लेकर है।

छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत अकुशल मजदूरों की मजदूरी 261 रुपए प्रतिदिन तय है। यानी अगर कोई मजदूर 6 दिन काम करता है तो उसे 1566 रुपए मिलने चाहिए। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है?

सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का फर्क चौंकाने वाला है।

एक महिला मजदूर ने बताया कि 261 रुपए तय है। हर हफ्ते के हिसाब से 6 दिन के काम का 1566 रुपए मिलना चाहिए। लेकिन कभी 7 सौ रुपए मिलता है तो कभी 8 सौ रुपए मिलता है।

एक अन्य मजदूर ने बताया कि मनरेगा की रोजी के तहत उन्हें कभी सौ रुपए मिलता है तो कभी डेढ़ सौ रुपए मिलते हैं। कभी भी 261 रुपए नहीं मिले। 

एक मजदूर ने बताया कि उन्हें कभी पूरी मजदूरी मिली ही नहीं है।

कोई मजदूर बता रहा है कि उसे 700 रुपए मिले, किसी के खाते में 800 रुपए पहुंचे। तो क्या उनकी मजदूरी कम कर दी गई है। या बकाया उनको बाद में दिया जाएगा। सवाल ये है कि जब मजदूरी तय है तो पूरी रकम कहां जा रही है?

चुनाव के समय हर हफ्ते मजदूरी का वादा, लेकिन दो-दो महीने नहीं मिल रही मजदूरी

दूसरी परेशानी भुगतान को लेकर है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में मनरेगा मजदूरों को हर हफ्ते मजदूरी देने का वादा किया था, लेकिन कई मजदूर आज भी भुगतान के लिए इंतजार कर रहे हैं। आखिरी पेमेंट दो महीने बाद मिली है।

मजदूरों के खाते में पैसा समय पर नहीं पहुंच रहा। जिन परिवारों का रोजमर्रा का खर्च इसी मजदूरी पर निर्भर है, उनके लिए हर दिन की देरी मुश्किलें बढ़ा रही है।

एक मजदूर ने बताया कि मजदूरी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। पिछले महीने ही दो महीने बाद मजदूरी मिली वह भी आधे से भी कम।

इसी तरह एक और मजदूर ने बताया कि मजदूरी के लिए बार-बार पंचायत के जिम्मेदारों से कहना पड़ता है लेकिन उन्हें भी नहीं पता होता कि मजदूरी कब मिलेगी।

एक महिला मजदूर ने बताया कि चुनाव के समय नेता लोग आए थे तो कहे थे कि हर हफ्ते मजदूरी मिलेगी, लेकिन मजदूरी हर हफ्ते मिलना तो दूर महीने भर में नहीं मिल पा रही है।

ऑनलाइन अटेंडेंस के चलते मजदूरी से ज्यादा हाजिरी में समय

तीसरी समस्या ऑनलाइन अटेंडेंस की है। अब हाजिरी मोबाइल ऐप और बायोमेट्रिक प्रक्रिया से जुड़ी है। कई जगह नेटवर्क की समस्या है, तो कहीं रेटिना या बायोमेट्रिक स्कैन नहीं हो पा रहा।

कुछ मजदूर ऐसे भी मिले जिन्होंने कई दिन काम किया, लेकिन हाजिरी दर्ज नहीं हुई। मजदूरों का कहना है कि जितना समय काम करने में नहीं लग रहा, उससे ज्यादा वक्त हाजिरी लगाने में निकल रहा है।

द लेंस ने देखा कि मजदूरों को हाजिरी के लिए किस तरह परेशान उठाना पड़ा है।

एक मजदूर ने बताया कि सुबह 6 बजे आए थे। 8 बजे से काम पूरा हो गया है। इसके बाद भी हाजिरी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। 10 बज गए लेकिन अभी तक हाजिरी नहीं लगी।

एक अन्य मजदूर ने बताया कि पिछले 6 दिन से वह काम कर रहे हैं लेकिन उनकी हाजिरी ही नहीं लग रही है। जबकि सब जानते हैं कि वे काम करने आ रहे थे, लेकिन ऑनलाइन सिस्टम में जब तक हाजिरी नहीं चढ़ेगी, उसकी हाजिरी नहीं लगेगी। 6 दिन काम करने के बाद भी उसे मजदूरी नहीं मिलेगी।

सवाल ये है कि अगर सिस्टम मजदूर की मौजूदगी ही दर्ज नहीं कर पाएगा तो उसे मजदूरी कैसे मिलेगी?

आखिर मजदूर न्याय किससे मांगे?

मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि गांव के गरीब परिवारों की जीवनरेखा है। लेकिन जब 261 रुपए की तय मजदूरी पूरी नहीं मिले, भुगतान समय पर न पहुंचे और हाजिरी दर्ज कराने के लिए मजदूरों को घंटों इंतजार करना पड़े, तो योजना के उद्देश्य पर ही सवाल खड़े होने लगते हैं।

सरकार दावा करती है कि तकनीक से पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन जमीनी स्तर पर मजदूर पूछ रहे हैं कि अगर तकनीक ही उनकी मजदूरी का रास्ता रोक दे तो उसका फायदा किसे मिल रहा है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मनरेगा मजदूरों को उनका पूरा हक मिल रहा है? अगर नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? और जो वादे चुनावी मंचों से किए गए थे, वे आखिर कब तक जमीन पर उतरेंगे?

ये तो मनरेगा की बात थी। वैसे भी सरकार ने इसकी जगह अब विकसित भारत जी राम जी योजना शुरू करने की तैयारी कर ली है। 1 जुलाई से यह जमीन पर नजर भी आने लगेगी, लेकिन क्या मनरेगा में मजदूरों को होने वाली परेशानी जी राम जी में नजर नहीं आएगी। सवाल हो रहा है कि जब मजदूर ने पूरे दिन पसीना बहाया है, तो उसकी मजदूरी आधी क्यों हो रही है? और अगर काम करने के बाद भी हाजिरी नहीं लग रही, तो फिर मजदूर आखिर न्याय किससे मांगे?

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