रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी में हाल ही में सरकारी साहित्य उत्सव की भव्यता और शोर-शराबे के बीच एक अलग मंच पर प्रगतिशील विचारों वाले लेखक, कवि और संस्कृतिकर्मी एकजुट हुए।
जन संस्कृति मंच की रायपुर इकाई ने 23 जनवरी को वृंदावन हॉल में ‘सृजन संवाद-3’ का आयोजन किया, जिसमें प्रतिरोध और विरोध की रचनाओं का पाठ-पाठन हुआ। इस कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े रचनाकारों के अलावा गंभीर पाठक और युवा बड़ी संख्या में शामिल हुए।
सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि असली लेखक या संस्कृतिकर्मी कभी भी सत्ता की गलत नीतियों का समर्थन नहीं कर सकता। एक सच्चा सृजनकर्ता स्वाभाविक रूप से सत्ता के विपक्ष में खड़ा होता है। यदि किसी रचनाकार को यह पता ही नहीं कि उसका पक्ष कौन सा है और वह किसके साथ है, तो उसे साहित्यकार मानना व्यर्थ है।
कार्यक्रम की शुरुआत वर्षा बोपचे ने की, जिन्होंने रामाज्ञा शशिधर के गीत ‘वे सारे हमारी कतारों में शामिल’ को प्रभावशाली ढंग से गाया। संस्कृतिकर्मी सुनीता शुक्ला ने वामिक़ जौनपुरी की पंक्तियां “यकीं से काम लो, वहमों-गुमाँ से कुछ नहीं होता, जमीं पर रहने वालों, आसमां से कुछ नहीं होता…” को तीक्ष्णता से प्रस्तुत किया।
मध्यप्रदेश के अशोक नगर से आई रंगकर्मी सीमा राजोरिया ने जावेद अख्तर की प्रसिद्ध नज़्म “एक हमारी और एक उनकी मुल्क में हैं आवाज़ें दो” का शानदार पाठ किया।
प्रसिद्ध कथाकार मनोज रुपड़ा ने पहली बार एक नई नज़्म सुनाई, जिसका मूल स्वर था कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हों, लेखक को अपना हस्तक्षेप लगातार दर्ज करता रहना चाहिए। श्रोताओं ने उनकी नज़्म और शैली की खूब सराहना की।
वरिष्ठ पत्रकार व कवि सुदीप ठाकुर रायपुर ने ‘दरबार’ नामक व्यंग्य कविता पढ़ी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ने प्रतिवाद और एकजुटता को वर्तमान भयावह समय की सबसे बड़ी जरूरत बताते हुए प्रभावशाली ग़ज़लें सुनाईं। पत्रकार समीर दीवान ने ‘सुपुर्द’ और ‘बीज’ शीर्षक की महत्वपूर्ण कविताएं प्रस्तुत कीं।
अशोक नगर से आए कवि हरिओम राजोरिया ने ‘एक तरह से’ नामक नई कविता के माध्यम से व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया।
कविता, कहानी और आलोचना के जाने-माने हस्ताक्षर बसंत त्रिपाठी (इलाहाबाद) ने छंदबद्ध व्यंग्य कविता ‘देश का नेता कैसा हो?’ का उत्कृष्ट पाठ किया। जन संस्कृति मंच रायपुर से जुड़े शायर अब्दुल जावेद नदीम, अलीम नकवी तथा जनवादी लेखक संघ भिलाई के शायर मुमताज़ ने अपनी रचनाओं से विरोध दर्ज किया।
संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी ने हाफ़िज़ मेरठी की ग़ज़ल ‘आबाद रहेंगे वीराने, शादाब रहेंगी…’ प्रस्तुत की। जन संस्कृति मंच की वरिष्ठ साथी रूपेंद्र तिवारी ने आभार जताया और बिलासपुर में मनोज रुपड़ा के साथ हुई घटना के बाद लिखी गई एक कविता भी पढ़ी। कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि श्रोताओं ने रचनाकारों से सीधा संवाद किया।
इस आयोजन में अनीता त्रिपाठी, संतोष सोनी, सीमा कुजूर, समीक्षा नायर, डॉ. संजू पूनम, सर्वज्ञ नायर, सनियारा खान, कल्याणी, नीलिमा मिश्रा, प्रियंका बघेल, इन्द्र राठौर, कनक कुमार, पीसी रथ, सुरेश वाहने, मिनहाज असद, राजेन्द्र जैन, समयलाल विवेक, गिरधर जी बरनवा, प्रकाश साहू, निसार अली, आलोक वर्मा, केशव तिवारी, अरुणकांत शुक्ला, शशिकांत गोस्वामी, राजेश कुमार मानस, मनोज कुमार सोनवानी, विभोर तिवारी, बालकृष्ण अय्यर, डॉ. विपल्व बंद्योपाध्याय, उमा प्रकाश ओझा, भागीरथी वर्मा, मांगीलाल यादव, शेखर नाग, डॉ. अखिलेश त्रिपाठी, बृजेन्द्र तिवारी, घनश्याम त्रिपाठी, अनूप रॉय, विवेक कुमार, डॉ. एनपी यादव, डेविड दत्त, डॉ. अंकुर शुक्ल, डॉ. नरेश कुमार साहू, अक्षतधर दीवान, विद्यानंद ठाकुर, कमल शुक्ला, एजाज कैसर, विकल्प, नरेश गौतम, तत्पुरुष सोनी, राकेश कुमार तिवारी, प्रेम दुबे, अखिलेश एडगर, नरोत्तम शर्मा, नाहिदा कुरैशी, नेमीचंद, राजेश गनौदवाले, आनंद बहादुर सहित कई प्रबुद्धजन और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे।

