छत्तीसगढ़ में वन क्षेत्रों के जलाशयों पर आदिवासियों के अधिकार का मुद्दा राष्ट्रपति भवन पहुंचा, नेता प्रतिपक्ष ने की वन अधिकार कानून लागू करने की मांग

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में स्थित जलाशयों पर आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों के अधिकार का मुद्दा अब राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुंच गया है। नेता प्रतिपक्ष Dr. Charan Das Mahant ने इस संबंध में राष्ट्रपति को पत्र भेजा था और हस्तक्षेप करने की मांग की थी। इस मांग पर राष्ट्रपति सचिवालय से जवाब मिलने के बाद राज्य में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

डॉ. महंत ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम के तहत वन क्षेत्रों के तालाब, नदी और नालों पर पहला अधिकार स्थानीय आदिवासी और वनवासी समुदायों का है। इसके बावजूद राज्य में बड़े जलाशयों को ठेके पर दिए जाने से स्थानीय समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों से वंचित हो रहा है।

महंत ने बताया कि उन्होंने पहले इस विषय पर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था और विधानसभा में भी सवाल उठाया था। सरकार की ओर से मिले जवाब में यह सामने आया कि वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) के तहत जलाशयों से जुड़े सामुदायिक अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया है।

इसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना है कि यदि इस प्रावधान को लागू किया जाए तो राज्य के हजारों आदिवासी परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।

1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र का हवाला

नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि छत्तीसगढ़ की वन भूमि में लगभग 1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र मौजूद है। इन जलाशयों पर 50 हजार से अधिक आदिवासी और पारंपरिक वन निवासी परिवारों की आजीविका निर्भर है।

उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान मछली पालन नीति के तहत 1000 हेक्टेयर से बड़े जलाशयों का आवंटन टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से बाहरी ठेकेदारों को किया जा रहा है। इससे स्थानीय समुदाय अपने ही क्षेत्र के संसाधनों पर अधिकार खो रहा है और कई स्थानों पर मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर है।

डॉ. महंत ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को छत्तीसगढ़ में तत्काल प्रभाव से लागू कराने के लिए आवश्यक निर्देश दिए जाएं। साथ ही राज्यपाल और राज्य सरकार को भी इस संबंध में उचित कार्रवाई करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

राष्ट्रपति सचिवालय से जवाब मिलने पर जताया आभार

राष्ट्रपति सचिवालय से पत्राचार का जवाब मिलने पर महंत ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इससे उम्मीद जगी है कि राज्य सरकार और प्रशासन आदिवासी समुदायों के सामुदायिक अधिकारों के इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगा।

उन्होंने कहा कि वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य केवल भूमि अधिकार देना नहीं, बल्कि जंगल, जल और प्राकृतिक संसाधनों पर पारंपरिक समुदायों के अधिकारों को भी सुनिश्चित करना है। ऐसे में जलाशयों पर स्थानीय समुदायों के अधिकारों का संरक्षण कानून की भावना के अनुरूप आवश्यक है।

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