
गुजरात के मोरबी से स्तब्ध कर देने वाली खबर आई है, जहां एक बेबस व्यक्ति ने मकान का किराया न दे पाने के कारण अपनी पत्नी और 13 साल की नाबालिग बेटी के दुष्कर्म करने का सौदा मकान मालिक से कर लिया!
आजीविका की तलाश करते हुए यह परिवार कुछ महीने पहले ही गुजरात के सुरेंद्रनगर से मोरबी आया था। परिवार ने दो हजार रुपये में किराए पर मकान लिया था, लेकिन आर्थिक परेशानियों के कारण जब मकान का किराए का बकाया बढ़ता गया, तो परिवार के मुखिया ने ऐसा सौदा कर लिया, जिसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो सकते हैं। उसने मकान मालिक को अपनी पत्नी और नाबालिग बेटी के यौन उत्पीड़न की इजाजत दे दी।
उस व्यक्ति की पत्नी की मां की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर उस व्यक्ति और मकान मालिक को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन इस घटना ने देश और दुनिया में म़ॉडल की तरह पेश किए जा रहे गुजरात के साथ ही पूरे देश में महिलाओं और वंचितों के हालात को लेकर गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं। इसे अपवाद कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन यह घटना आजाद भारत के 80 साल के सफर में एक काला धब्बा है।
शर्मसार कर देने वाली यह घटना ऐसे समय आई है, जब प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को नीदरलैंड में भारतवंशियों को संबोधित करते हुए याद किया है कि किस तरह से 16 मई, 2014 को भाजपा की अगुआई में एनडीए सरकार बनी थी। मोदी तबसे देश के प्रधानमंत्री हैं और उसके पहले 13 साल तक वह गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे।
नरेंद्र मोदी को याद ही होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद 9 जून, 2014 को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने आजादी के पचहत्तरवें वर्ष 2022 तक देश के हर नागरिक को पक्का मकान मुहैया कराने का वादा किया था। इसके लिए बकायदा पीएम आवास योजना की घोषणा की गई और इस पर 2015 से काम भी शुरू किया गया।
यह कहने की जरूरत नहीं है कि जिन लोगों के पास अब तक खुद का मकान नहीं है, उसमें गुजरात का वह परिवार भी शामिल है, जिसके मुखिया ने मकान किराए के कुछ हजार रुपयों के बकाए के लिए अपनी पत्नी और नाबालिग बेटी के दुष्कर्म किए जाने का सौदा कर लिया!
पता नहीं गुजरात से आई इस विचलित करने वाली खबर पर हाल ही में बेरोजगारों को ‘कॉकरोच’ बताने वाले विवादास्पद बयान के कारण सुर्खियां बनने वाले माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की नजर पड़ी है या नहीं। हालाँकि उनका ताजा बयान भी आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि उनकी यह टिप्पणी बेरोजगारों पर नहीं, बल्कि फर्जी डिग्राधारियों पर थी।
फिर भी, न्यायपालिका से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह गुजरात की घटना का संज्ञान ले और उस महिला और उसकी बेटी की सुरक्षा के साथ ही उनके आवास की व्यवस्था सुनिश्चित करने के राज्य सरकार को निर्देश दे।
गुजरात की घटना एक समाज के रूप में हमारे क्षरण को भी दिखाती है और सोचने को मजबूर करती है कि महिलाओं को सम्मानजनक जीवन और सुरक्षा देने में राज्य भी अपना संवैधानिक दायित्व ठीक से नहीं निभा रहा है।
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