शीर्ष कमांडर बारसे देवा ने साथियों के साथ डाले हथियार

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लेंस डेस्‍क। नक्सलवाद के खिलाफ चल रही मुहिम को आज बड़ी सफलता मिली। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के मूल निवासी और माओवादी संगठन की सबसे मजबूत सैन्य इकाई पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) बटालियन नंबर-1 के कमांडर बारसे देवा उर्फ सुक्का ने अपने कई सशस्त्र साथियों के साथ तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

यह घटना शुक्रवार को हुई, जबकि शनिवार को इसे औपचारिक रूप से सार्वजनिक किया गया। देवा पर छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सरकारों की ओर से कुल 75 लाख रुपये से अधिक का इनाम घोषित था।

देवा की उम्र करीब 45-48 वर्ष है और वह मारे जा चुके माओवादी नेता मडवी हिडमा का निकट सहयोगी था। हिडमा की पिछले साल नवंबर में आंध्र प्रदेश में मुठभेड़ में मौत के बाद देवा ने बटालियन की कमान संभाली थी। दोनों पूवर्ती गांव (सुकमा) के रहने वाले थे, जो लंबे समय तक माओवादियों के नियंत्रण में रहा। सुरक्षा बलों द्वारा 2024 में वहां कैंप स्थापित करने के बाद इलाका सरकारी नियंत्रण में आ गया।

खबरों में दावा किया गया है कि देवा अपनी टीम के साथ अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ से तेलंगाना के घने जंगलों में घुसा था और वहां राज्य समिति के सचिव बडे चोक्का राव उर्फ दामोदर के साथ मिलकर गतिविधियां चला रहा था। तेलंगाना की एलीट ग्रेहाउंड्स यूनिट और खुफिया एजेंसियों के लगातार दबाव व घेराबंदी ने उनकी गतविधियों को काफी हद तक ठप कर दिया।

माओवादी आंदोलन से 25 साल पुराना नाता

देवा का माओवादी आंदोलन से जुड़ाव करीब 25 वर्ष पुराना है। 2000 में शुरू हुआ उसका सफर स्थानीय दस्तों से होते हुए ऊंचे पदों तक पहुंचा। वह दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी का सदस्य था और हथियारों की खरीद, लॉजिस्टिक्स और बड़े हमलों की योजना बनाने में माहिर माना जाता था।

पुलिस रिकॉर्ड्स में उसके नाम कई घातक घटनाएं दर्ज हैं, जिनमें 2013 का झीरम घाटी हमला (कांग्रेस नेताओं सहित 27 लोगों की मौत), 2021 का बीजापुर हमला (22 जवानों की शहादत) और 2006-2019 के बीच कई आईईडी विस्फोट शामिल हैं। हाल के वर्षों में भी 2025 के शुरुआती महीनों में तेलंगाना व छत्तीसगढ़ में हुए कुछ हमलों का नेतृत्व करने का शक उस पर था।

आत्मसमर्पण के समय देवा के पास से एक लाइट मशीन गन सहित हथियार बरामद हुए। उसके साथ 15 से 20 कैडरों ने भी हथियार सौंपे। अधिकारियों का मानना है कि बटालियन-1, जो कभी 130 से अधिक सशस्त्र सदस्यों वाली मजबूत यूनिट थी, जो अब बुरी तरह कमजोर हो चुकी है। दावा किया जा रहा है कि हिडमा की मौत और देवा के सरेंडर से पीएलजीए की रीढ़ टूट गई है, जिससे संगठित बड़े हमलों की क्षमता लगभग खत्म हो गई।

तेलंगाना के डीजीपी बी. शिवधर रेड्डी ने इसे माओवादी आंदोलन का अंतिम अध्याय करार देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ के सुकमा क्षेत्र में अब लाल आतंक की कहानी समाप्त हो रही है। उन्होंने बाकी नेताओं से हिंसा छोड़कर पुनर्वास नीति का लाभ उठाने की अपील की। 2025 में ही तेलंगाना में 500 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया था।



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