विश्व प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर महाबोधि मंदिर पर हिंदू नियंत्रण क्यों?

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“संसार में किसी भी धार्मिक स्थल पर दूसरे धर्म का कब्जा नहीं है। मस्जिद को मुसलमान चलाते हैं, मंदिर को हिंदू, गुरुद्वारे को सिख, लेकिन महाबोधि मंदिर में हिंदुओं का कब्जा है। आखिर क्यों?” बिहार के गया में बौद्ध धर्म के मानने वाले अधिकांश लोगों का यह सवाल विश्व प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर को लेकर है।

भारत के बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। यह वह पवित्र भूमि है जहाँ सिद्धार्थ गौतम ने 2500 वर्ष पूर्व ज्ञान प्राप्त किया था। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त यह मंदिर प्रतिवर्ष लाखों तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह गुप्त काल के अंतिम दौर का मंदिर है। इस मंदिर के संबंध में काफी वर्षों से हिंदू पुजारियों और बौद्धों के बीच घमासान मचा हुआ है।

महाबोधि मंदिर की जिम्मेदारी बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी के हाथों में है। 1949 के बोधगया टेंपल एक्ट से बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी का गठन हुआ है। एक्ट के सेक्शन 3 के मुताबिक बोधगया टेम्पल मैनेजमेंट कमेटी में 4 बौद्ध हैं, 4 हिंदू और चेयरमैन गया के जिलाधिकारी होते हैं। कमेटी के अध्यक्ष डीएम होते हैं। अगर डीएम हिंदू नहीं होते हैं तो किसी हिंदू सदस्य को ही अध्यक्ष बना दिया जाता था। हालांकि 2013 में इस एक्ट में संशोधन किया गया और डीएम के हिंदू होने के प्रावधान को खत्म कर दिया गया। सारा विवाद कमेटी में शामिल हिंदुओं को लेकर है। वर्तमान में समिति में डीएम को छोड़कर चार बौद्ध और दो हिंदू सदस्य हैं।

हजारों भिक्षु, लामा और बौद्ध अनुयायी बोधगया से पटना आएंगे

प्रदर्शन वाली जगह पर पोस्टर चिपका हुआ है कि ‘REPEAL BT ACT 1949’; ‘ALL MEMBERS OF BTMC SHOULD BE BUDDHIST’. हिंदी में इनका मतलब है ‘बोधगया टेंपल एक्ट 1949 खत्म हो’; ‘BTMC के सभी मेंबर बौद्ध हों’।

गया के रहने वाले सृजन सन्नी स्थानीय पत्रकार के साथ समाजसेवी हैं। वह बताते हैं कि,”बौद्ध भिक्षु पहले महाबोधि मंदिर के पास आमरण अनशन पर बैठे थे, लेकिन 27 फरवरी को प्रशासन ने इन्हें महाबोधि मंदिर परिसर से हटा दिया। इसके बाद 1 मार्च से मंदिर से तकरीबन एक किलोमीटर दूर दोमुहान रोड पर जयप्रकाश पार्क के निकट सरकारी जमीन पर बौद्ध भिक्षु धरना प्रदर्शन कर रहे हैं।”

स्थानीय नागरिकों के मुताबिक हाल के दिनों में बिहार के गया में महाबोधि मंदिर के संचालन में पूर्ण बौद्ध नियंत्रण की मांग को लेकर महुआबाद में पिछले 298 दिनों से चल रहे अनिश्चितकालीन धरने ने फिर जोर पकड़ा है। अपनी मांग को लेकर ऑल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम के नेतृत्व में हजारों भिक्षु, लामा और बौद्ध अनुयायी बोधगया से पटना आ सकते हैं।

2025 में बिहार के बोधगया में स्थित विश्व प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर को कुल 2 करोड़ 2 लाख 3 हजार 494 रुपये का दान प्राप्त हुआ है। इसमें 1 करोड़ 29 लाख 41 हजार 100 रुपये भारतीय मुद्रा और 72 लाख 62 हजार 394 रुपये विदेशी मुद्रा शामिल हैं।

बौद्ध भिक्षुओं से मारपीट

मई 2025 में महाबोधि महाविहार परिसर में बौद्ध भिक्षुओं के साथ मारपीट की खबरें आई थीं। ऑल इंडिया पँथर सेना के अध्यक्ष दीपक केदार ने ट्वीट करके आरोप लगाया कि बोधगया में महाबोधि बुद्ध विहार मुक्ति आंदोलन स्थल पर कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा जय श्री राम के नारे लगाए और बौद्ध भिक्षुओं को मारा गया।

अखिल भारतीय दलित, आदिवासी, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. ओम सुधा ने भी असामाजिक तत्वों के द्वारा बौद्ध भिक्षुओं के साथ मारपीट और भंते विनाचार्य के लापता होने की खबर बताई।

इस घटनाक्रम पर प्रकाश आंबेडकर ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि यह न केवल भारत के बौद्धों का, बल्कि दुनिया भर के 50 करोड़ बौद्धों का भी अपमान है।

बौद्ध के इस आंदोलन को भीम आर्मी भी समर्थन कर रही है। इसी पार्टी से जुड़े दिनेश कुमार बताते हैं कि,”बुद्ध के देश में बौद्ध धर्मावलंबी को ही अपने मंदिर पर अधिकार के लिए लड़ाई लड़ना पड़ता है।”

मध्य प्रदेश के सांची से गया घूमने आई चिन्मयी बताती है कि,” हम लोग भी इस आंदोलन के समर्थन में हैं। हम बौद्धों के लिए सबसे मुख्य जगह यही है। बौद्ध के इस आंदोलन को समर्थन करने के लिए राज्य के कई हिस्सों से लोग आए थे।

गया में पिंडदान का सामान बेच रहा सत्यम बताता है कि,”बुद्ध भी तो हिंदू ही थे। यहां पर शिवलिंग और पांचों पांडवों के मंदिर हैं। बहुत पुराने समय से ही हिंदुओं की इस स्थान से जुड़ी मान्यताएं हैं।” वहीं बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों का कहना है कि हमारे बौद्ध मंदिर को तोड़कर हिंदू का मंदिर बनाया गया है।

इतिहास में क्या-क्या हुआ

आजादी से पहले 1922 में गया में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में भी यह मुद्दा उठाया गया था। इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद समेत कई नेताओं के दखल के बाद 1948 में बोधगया टेंपल बिल बिहार विधानसभा में पेश किया गया। कानून बनने के बाद 1949 में इसे लागू कर दिया गया। 4 साल बाद 1953 में मंदिर का कार्यभार बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी को सौंप दिया गया।

1990 के दशक में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बीटीए की जगह बोधगया महाविहार विधेयक का मसौदा तैयार किया था। इसमें मंदिर का प्रबंधन बौद्धों को सौंपने की अनुमति दी गई थी। इस विधेयक में मंदिर के अंदर मूर्ति विसर्जन और हिंदू विवाह पर रोक लगाई गई थी, लेकिन यह विधेयक ठंडे बस्ते में चला गया।

वंचित बहुजन आघाडी पार्टी से जुड़े सुजात अंबेडकर बताते हैं कि,”देश की पहचान बुद्ध से है, यह बात सरकार को नहीं भूलनी चाहिए। वंचित बहुजन आघाडी बौद्धों के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक अधिकारों और महाबोधि महाविहार की मुक्ति के लिए अपना संघर्ष निरंतर जारी रखेगी।”





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