लोक सुनवाई में सिंहासन पर बैठे अधिकारी, सलाखों के पीछे खड़ी जनता ने कर दिया खुला विरोध

NFA@0298
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दंतेवाड़ा। लोकसुनवाई में जनता सलाखों के पीछे खड़ी थी और दो अधिकारी सिंहासन पर विराजमान थे। 30 दिसंबर, मंगलवार को यह हकीकत में हुआ है छत्तीसगढ़ के बस्तर में। जहां दंतेवाड़ा में एक फैक्ट्री की क्षमता में इजाफा करने पर्यावरण स्वीकृति के लिए लोक सुनवाई रखी गई थी।

आर्सेलर मित्तल निप्पोन स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड आयरन ओर बेनिफिशिएशन प्लांट क्षमता 8 मिलियन टन/वर्ष से 12 मिलियन टन वर्ष करने जा रही है। इसकी पर्यावरण स्वीकृति के लिए मंगलवार को लोक सुनवाई रखी गई थी।

इस लोक सुनवाई में एक दर्जन पंचायत के जनप्रतिनिधि और बस्तर संभाग के तमाम दलों के नेता भी मौजूद थे। लोक सुनवाई के दौरान जो व्यवस्था की गई थी उससे जनप्रतिनिधि बेहद आहत हुए।

जहां अपर कलेक्टर और क्षेत्रीय पर्यावरण संरक्षण मंडल के अधिकारी बैठे थे, उस मंच को बेहद ऊंचाई पर तैयार किया गया था साथ ही पूरी तरह लोहे की जाली से कवर किया गया था। जनप्रतिनिधि उस जाली के बाहर से माइक पकड़कर अपनी बात रख पा रहे थे।

कई जनप्रतिनिधियों ने अपना विरोध दर्ज करवाया और कहा इस तरह की लोक सुनवाई पहली बार हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई राजा सिंहासन पर बैठकर अपने फैसले सुनाने के लिए बैठा हो। इस दृश्य को देखकर पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष तूलिका कर्मा लोक सुनवाई के दौरान भड़क उठीं।

उन्होंने कहा कि यह लोक सुनवाई कम अकबर का दरबार ज्यादा लग रहा है। पर्यावरण स्वीकृति को लेकर पर्यावरण से संबंधित अधिकारियों को लोगों से सलाह लेनी चाहिए उनके बीच में रहकर उनकी समस्याओं को जानना चाहिए। यहां तो अधिकारी रूपी राजा दरबार चला रहे हैं।

इस लोक सुनवाई का उन्होंने खुले आम विरोध किया और वहां से छोड़कर निकल गईं। इसी तरह कड़पमाल के सरपंच ने भी मुखालफत की यहां का पहाड़ यहां की मिट्टी और यहां के पानी पर पहला अधिकार आदिवासियों का है। हम कंपनियों को दे रहे हैं। कंपनियां बताएं उन्होंने आयरन हिल के नीचे बसे दर्जनों गांव को विकास के रूप में क्या दिया। धूल फांक रहा है, खून नुमा लाल पानी पी रहा है। और बेबसी की जिंदगी 60 सालों से आदिवासी जी रहा है।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संयुक्त महासचिव उमाशंकर शुक्ला ने कहा तमाम लोक सुनवाई देखी हैं लेकिन इस जाली ने तो अधिकारी और जनता के बीच अंतर पैदा कर दिया है। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र है पेसा एक्ट लागू है और बस्तर में अधिकारियों का यह रवैया झकझोरता है। पर्यावरण की स्वीकृति का सिर्फ ढोंग रचा जा रहा है केंद्र सरकार ने तो पहले से अनुमति दे रखी है।

पाइप लाइन विस्तार के लिए आर्सेलर मित्तल सिर्फ ढोंग करने में जुटी हुई है। इंद्रावती नदी में पानी नहीं है डंकनी संकनी नदी को एनएमडीसी ने प्रदूषित कर दिया है। अब शबरी नदी के पानी को भी तेजी से दोहन की प्रक्रिया शुरू हो रही है। शबरी नदी में विशेष प्रजाति का झींगा पाया जाता है उसके संरक्षण के लिए कंपनी के पास क्या प्लान है पहले वो बताए तभी इस नदी से पानी का दोहन करने दिया जाएगा। अन्यथा कंपनी अपना माल रेल लाइन के जरिए ले जाए या फिर ट्रकों के माध्यम से। शबरी नदी का एक बूंद पानी का दोहन नहीं होने दिया जाएगा।



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