रेलवे स्टेशन की भीड़, एक गलत ट्रेन, और बरसों का बिछोह

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भारत में हर साल हजारों बच्चे बिछड़ते हैं, कई कभी नहीं लौटते 

झारखंड के राजा गोपे की कहानी, जो छह साल की उम्र में ट्रेन में भटक कर केरल पहुँच गया और तेरह साल बाद घर लौटा, भारत में खोए बच्चों की एक बड़ी और अक्सर अनदेखी समस्या की ओर ध्यान दिलाती है। रेलवे स्टेशन, मेले, बस अड्डे और शहरों की भीड़ में हर साल हजारों बच्चे अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होती है। इनमें से कई बच्चे कभी वापस नहीं मिलते। लेकिन कुछ मामलों में सालों बाद ऐसे पुनर्मिलन भी होते हैं जो किसी चमत्कार से कम नहीं लगते। राजा गोपे का मामला ऐसा ही है, लेकिन यह अकेला नहीं है। पिछले दो दशकों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बच्चे हजारों किलोमीटर दूर पहुँच गए और वर्षों बाद परिवार तक लौट सके।

रेलवे स्टेशन: बिछोह का सबसे बड़ा मंच

भारत में बच्चों के खोने की सबसे आम जगह रेलवे स्टेशन और ट्रेन यात्राएँ मानी जाती हैं। देश के विशाल रेल नेटवर्क में रोज़ लाखों लोग यात्रा करते हैं। भीड़, शोर और जल्दबाजी के बीच छोटे बच्चे अक्सर पल भर में नजरों से ओझल हो जाते हैं।

कई बार बच्चा गलत ट्रेन में चढ़ जाता है, और कुछ घंटों में वह अपने राज्य से सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर पहुँच जाता है। जब तक परिवार खोजबीन करता है, बच्चा किसी और शहर में पहुँच चुका होता है। भाषा बदल जाती है, पहचान खो जाती है और बच्चे के लिए घर लौटना लगभग असंभव हो जाता है।

इसी तरह की एक घटना बिहार के एक बच्चे के साथ हुई थी, जो 2000 के दशक में ट्रेन में भटक कर राजस्थान पहुँच गया था। वह वर्षों तक एक बाल गृह में रहा और बाद में पहचान के आधार पर अपने परिवार तक पहुँच पाया।

सरू ब्रियरली: भारत से ऑस्ट्रेलिया तक

भारत में खोए बच्चों की कहानियों में सबसे प्रसिद्ध मामला सरू ब्रियरली का है।

1986 में मध्य प्रदेश के खंडवा रेलवे स्टेशन पर पाँच साल का सरू अपने बड़े भाई के साथ ट्रेन में बैठा था। भाई काम की तलाश में गया था और सरू स्टेशन पर इंतजार कर रहा था। लेकिन वह एक खाली ट्रेन में चढ़ गया और सो गया।

जब उसकी आँख खुली, तब ट्रेन हजारों किलोमीटर दूर कोलकाता पहुँच चुकी थी।

सरू को बाद में एक अनाथालय भेज दिया गया और अंततः उसे एक ऑस्ट्रेलियाई दंपती ने गोद ले लिया।

करीब 25 साल बाद उसने गूगल अर्थ की मदद से अपने पुराने इलाके की खोज की और अंततः अपने असली परिवार को ढूँढ निकाला। उसकी कहानी पर बाद में फिल्म “लायन” भी बनी।

ट्रेन से तमिलनाडु पहुँचा उत्तर भारत का बच्चा

कुछ साल पहले एक मामला सामने आया जिसमें उत्तर भारत का एक बच्चा ट्रेन में भटक कर तमिलनाडु पहुँच गया था।

वह अपने घर से निकलकर रेलवे स्टेशन पहुँच गया था और किसी ट्रेन में चढ़ गया। बाद में रेलवे पुलिस ने उसे बचाया और एक बाल गृह में भेज दिया।

बच्चा अपनी भाषा के अलावा कुछ नहीं बोल पाता था। अधिकारियों को केवल उसके नाम और गाँव के धुंधले उच्चारण के आधार पर खोज करनी पड़ी। महीनों की कोशिश के बाद उसका परिवार ढूँढा जा सका।

ऐसे मामलों में भाषा सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। बच्चा जिस राज्य में पहुँचता है वहाँ उसकी भाषा कोई नहीं समझता, और वह स्थानीय भाषा नहीं समझ पाता।

दिल्ली से हरियाणा, फिर उत्तर प्रदेश

एक और मामला दिल्ली में सामने आया था जहाँ एक छोटा बच्चा अपने परिवार से बिछड़कर ट्रेन में बैठ गया और हरियाणा पहुँच गया। वहाँ से वह किसी और ट्रेन में चढ़ गया और उत्तर प्रदेश पहुँच गया।

रेलवे पुलिस ने उसे पकड़कर बाल कल्याण समिति के पास भेज दिया।

परिवार की पहचान करने में कई महीने लग गए, क्योंकि बच्चा अपने घर का पूरा पता नहीं बता पा रहा था। अंततः पुलिस ने स्कूल के नाम और इलाके की कुछ यादों के आधार पर उसके परिवार को ढूँढ लिया।

सोशल मीडिया का नया दौर

पहले ऐसे मामलों में बच्चों को परिवार तक पहुँचाना बेहद कठिन होता था।

लेकिन पिछले एक दशक में सोशल मीडिया ने इसमें बड़ी भूमिका निभानी शुरू की है। अब किसी बच्चे की फोटो या वीडियो वायरल हो जाए तो कई बार कुछ ही दिनों में उसका परिवार मिल जाता है।

राजा गोपे के मामले में भी यही हुआ। एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया गया जिसमें उसने अपने गांव के बारे में कुछ धुंधली यादें बताईं। उसी वीडियो के आधार पर झारखंड के लोगों ने पहचान कर ली।

यह तकनीक और सामुदायिक सहयोग का एक नया उदाहरण है।

रेलवे चिल्ड्रेन और अन्य संस्थाएँ

भारत में कई संस्थाएँ विशेष रूप से रेलवे स्टेशनों पर भटकते बच्चों की मदद के लिए काम करती हैं।

रेलवे चिल्ड्रेन इंडिया, चाइल्डलाइन, और विभिन्न राज्य सरकारों के बाल संरक्षण विभाग ऐसे बच्चों को बचाने, उनकी देखभाल करने और परिवार तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

रेलवे स्टेशनों पर कई जगह अब ऐसे हेल्प डेस्क बनाए गए हैं जहाँ अकेले या संकट में दिखने वाले बच्चों को तुरंत संरक्षण में लिया जा सकता है।

बिछोह की मनोवैज्ञानिक कीमत

जो बच्चे वर्षों तक परिवार से दूर रहते हैं, उनके लिए घर लौटना भी आसान नहीं होता।

वे नई भाषा, नए दोस्तों और नई जिंदगी के साथ बड़े हो चुके होते हैं। कई बार उन्हें अपने ही गांव में अजनबी जैसा महसूस होता है।

राजा गोपे के मामले में भी यही स्थिति बताई जाती है। वह मलयालम बोलने लगा था और अपनी मूल भाषा लगभग भूल चुका था। उसके लिए झारखंड लौटना एक तरह से नई जिंदगी शुरू करने जैसा है।

हर साल हजारों बच्चे

भारत में बच्चों के लापता होने का मुद्दा अभी भी गंभीर है।

कई मामलों में बच्चे मानव तस्करी, बाल मजदूरी या अन्य शोषण का शिकार भी हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में वे केवल भटक जाते हैं, और फिर वर्षों तक पहचान के बिना किसी और शहर में जीवन बिताते हैं।

राजा गोपे और सरू ब्रियरली जैसे मामलों में कहानी का अंत सुखद रहा। लेकिन हर कहानी का अंत ऐसा नहीं होता।

एक उम्मीद की कहानी

राजा गोपे की घर वापसी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि कभी-कभी समय, तकनीक और मानवीय प्रयास मिलकर असंभव लगने वाली दूरी को भी मिटा सकते हैं।

छह साल का जो बच्चा एक गलत ट्रेन में बैठकर अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर चला गया था, वही अब एक जवान के रूप में अपने गांव वापस लौटा है।

यह केवल एक परिवार का मिलन नहीं है, यह उस उम्मीद की कहानी है जो वर्षों के बिछोह के बाद भी खत्म नहीं होती।

 

भारत में हर साल कितने बच्चे लापता होते हैं?

भारत में बच्चों के लापता होने का मुद्दा बहुत बड़ा है, लेकिन अक्सर यह खबरों के शोर में दब जाता है। National Crime Records Bureau (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल हजारों बच्चे घर से गायब हो जाते हैं। इनमें से कई अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं, कुछ अपहरण या मानव तस्करी के शिकार होते हैं, और कुछ रोजगार या रोमांच की तलाश में घर छोड़ देते हैं।

एनसीआरबी की हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारत में हर साल लगभग डेढ़ लाख से अधिक बच्चे लापता दर्ज किए जाते हैं। 2022 के आंकड़ों में करीब 1.62 लाख बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई थी। इनमें से बड़ी संख्या लड़कियों की होती है। कई मामलों में कुछ ही दिनों या महीनों में बच्चे मिल जाते हैं, लेकिन हजारों बच्चे ऐसे भी होते हैं जिनका पता लंबे समय तक नहीं चलता।

इन मामलों में सबसे अधिक संख्या बड़े राज्यों से आती है। मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लापता बच्चों के मामले अपेक्षाकृत अधिक दर्ज होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आबादी अधिक होने के साथ-साथ गरीबी, पलायन और शहरीकरण भी इसके कारणों में शामिल हैं।

सरकार ने पिछले वर्षों में बच्चों को खोजने के लिए कई डिजिटल और प्रशासनिक तंत्र बनाए हैं। उदाहरण के लिए TrackChild Portal नामक राष्ट्रीय पोर्टल लापता और बरामद बच्चों का डेटा जोड़ता है। इसी तरह Childline India Foundation द्वारा संचालित हेल्पलाइन 1098 संकट में फंसे बच्चों की सहायता के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहती है। रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर भी विशेष इकाइयाँ बनाई गई हैं ताकि अकेले या भटकते बच्चों को तुरंत संरक्षण दिया जा सके।

इसके बावजूद चुनौती बड़ी बनी हुई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई परिवार पुलिस में शिकायत दर्ज ही नहीं कराते, खासकर प्रवासी मजदूरों या गरीब समुदायों में। इसलिए वास्तविक संख्या आधिकारिक आंकड़ों से भी अधिक हो सकती है। (chatgpt की मदद से तैयार)



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