‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : झीरम को लेकर नेताओं के नार्को टेस्ट की मांग तो हम बरसों से करते आ रहे हैं…
सुनील कुमार ने लिखा है
05-Jan-2026 4:55 PM
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने अपने एक प्रवक्ता विकास तिवारी को इस जिम्मेदारी से हटा दिया है, और स्पष्टीकरण मांगा है कि उन्होंने किस आधार पर पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पिछले एक मंत्री कवासी लखमा के नार्को टेस्ट की मांग की है। यह मांग करने के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस के इस प्रवक्ता ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान दिए गए एक बयान पर भी सवाल उठाए थे जिसमें नड्डा ने बस्तर के झीरम घाटी नक्सल हमले में कांग्रेस नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए थे, और उनके शामिल होने की बात कही थी। विकास तिवारी ने एक औपचारिक बयान दिया था कि झीरम घाटी मामले की जांच कर रहे न्यायिक आयोग को भाजपा नेताओं के साथ-साथ भूपेश बघेल, और कवासी लखमा का भी नार्को टेस्ट कराना चाहिए। उल्लेखनीय है कि भूपेश बघेल इस हमले के बाद से दर्जनों बार सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि झीरम साजिश के सुबूत उनकी जेब में हैं। और कवासी लखमा झीरम हमले में घिरे ऐसे अकेले बड़े कांग्रेस नेता थे जिन्हें नक्सलियों ने वहां से जाने दिया था। कवासी लखमा को लेकर बार-बार यह सवाल उठते थे कि नक्सलियों ने उनके साथ यह रियायत क्यों की थी, क्योंकि उनका विधानसभा क्षेत्र घोर नक्सल प्रभावित इलाके में आता है। भूपेश बघेल एनआईए से परे राज्य सरकार की एजेंसी से भी झीरम की जांच करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गए थे, और उनका यह कहना जारी रहा कि साजिश के सुबूत उनकी जेब में हैं।
प्रदेश कांग्रेस के एक प्रवक्ता को लेकर हम अपने संपादकीय में लिखना जरूरी नहीं समझते, लेकिन इस विवाद में जो मुद्दा सामने आया है, उस पर हम बरसों से लिखते आए हैं। एक दशक से ज्यादा पुराने झीरम हमले को लेकर भूपेश बघेल ने अपने पास सुबूत होने का जो दावा किया, उस पर हम पहले भी यह मांग कर चुके हैं कि अगर किसी भी साजिश के सुबूत किसी के पास हैं, तो उन्हें जांच एजेंसियों को देना उनकी मर्जी की बात नहीं होती, उनकी कानूनी जिम्मेदारी होती है। फिर झीरम जैसा बड़ा हिंसक और हत्यारा हमला जिसमें कांग्रेस ने अपने बहुत से दिग्गज नेताओं को खो दिया था, उनके सुबूत कोई कांग्रेस नेता जेब में रखकर चले, और जांच एजेंसी को न दे, यह बात तो पार्टी के स्तर पर भी अटपटी है, और जब पांच बरस मुख्यमंत्री रहते हुए भूपेश बघेल ने इस बात को जारी रखा, तब तो उनकी यह संवैधानिक जिम्मेदारी भी थी कि वे अपनी जेब के सुबूत जांच एजेंसी को दें। हमने कई तरह के मामलों को लेकर यह बात बार-बार लिखी है कि सरकारी या दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों की जनता के प्रति इतनी जवाबदेही होनी चाहिए कि वे अपने पास की जानकारियों को लेकर नार्को टेस्ट के लिए तैयार रहें, जिनसे सच्ची बात सामने आने की एक संभावना बनती है। न सिर्फ भूपेश बघेल, और झीरम हमले को लेकर, बल्कि भ्रष्टाचार और किसी भी तरह की और साजिश को लेकर भी हमारा यही रूख है कि जनता के पैसों पर तनख्वाह, वेतन-भत्तेे, सहूलियतें, और खास दर्जा पाने वाले सारे लोगों को नौबत और जरूरत पडऩे पर नार्को टेस्ट के लिए तैयार रहना चाहिए, और अपने शपथ लेने या काम संभालने के वक्त ही उन्हें ऐसी शर्त पर सहमति के दस्तखत करने चाहिए। आखिर जनता कब तक महज बयानबाजी देखती और सुनती रहे? नेताओं और अफसरों को, जजों और दूसरे जनसेवकों को, और जनसेवकों से परे जनता के पैसों से कोई भी मेहनताना पाने वाले लोगों को किसी जुर्म की जांच में जरूरत पडऩे पर नार्को टेस्ट के लिए तैयार रहना चाहिए। जो लोग ऐसी सहमति पर दस्तखत न करें, उन्हें इस किस्म की किसी भी जिम्मेदारी से परे रखने का एक कानून बनाना चाहिए। लोकतंत्र में जनता इतनी फिजूल की नहीं है कि दशकों तक लोग अपने आरोप या अपने झूठ दोहराते रहें, और उन्हें लेकर सिर्फ राजनीति चलती रहे।
लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन में तथाकथित वीआईपी लोगों की जवाबदेही आम लोगों के मुकाबले काफी अधिक रहनी चाहिए, क्योंकि खास व्यक्ति मानकर उन्हें खास अधिकार दिए जाते हैं। आज देश में जितने तरह के भ्रष्टाचार, और सत्ता के बलात्कार के मामले सामने आते हैं, उनकी जांच राजनीतिक ताकत तले कुचल जाती है। बहुत ताकतवर लोगों के खिलाफ जुर्म साबित नहीं हो पाते। ड्यूटी पर किसी अफसर को अगर क्रिकेट के बल्ले से दिनदहाड़े कैमरों के सामने पीटा जाए, तो उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। वैसे में अगर बल्लेबाज गुंडे विधायक के नार्को टेस्ट का अनिवार्य प्रावधान रहता, तो मार खाने वाले अफसर की याददाश्त खो जाने पर भी नार्को टेस्ट से असलियत सामने आ जाती। इसलिए लोकतंत्र में विधानसभाओं, और संसद तक पहुंचने वाले, तरह-तरह की राजनीतिक, और संवैधानिक ताकत के ओहदों पर बैठने वाले लोगों की अनिवार्य नार्को टेस्ट की शर्त लागू हो जाए, तो बहुत तरह के फर्जी राजनीतिक बयान भी बंद हो जाएंगे। आज तो हालत यह हो गई है कि आमतौर पर मीडिया भी ताकतवर नेताओं से असुविधाजनक सवाल पूछने से कतराने लगा है, और किसी स्टेनोग्राफर की तरह बयान नोट या रिकॉर्ड करने लगा है, किसी हरकारे की तरह उस बयान को ले जाकर दूसरे नेता से उस पर बयान लेने लगा है। इधर-उधर से बयान जुटाकर सामने रखने को ही अब आमतौर पर पत्रकारिता मान लिया गया है, वरना नेताओं के लापरवाह, गैरजिम्मेदार, और जाहिर तौर पर पहली नजर में झूठे दिखते बयानों को लेकर उन्हें ऐसा घेरा जा सकता है कि वे दुबारा लापरवाह बयान देने से कतराने लगें। लेकिन जब लोकतंत्र में कोई संस्था अपना काम जिम्मेदारी से नहीं करती, तो लोग उसकी तरफ से बेफिक्र होकर मनमानी बातें करने लगते हैं।
सार्वजनिक जीवन की पारदर्शिता, और लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही को मजबूत बनाने के लिए भारत में ऐसा कानून बनाना चाहिए कि ताकतवर सदनों, और ओहदों, कार्यालयों पर काबिज लोगों से जरूरत पडऩे पर उनकी ताजा सहमति के बिना भी उनका नार्को टेस्ट करवाया जाए। इससे भारत का लोकतंत्र इतना पारदर्शी हो जाएगा कि कई तरह के भ्रष्टाचार खत्म हो जाएंगे। जिस तरह देश में यूपीए सरकार के वक्त आरटीआई कानून बना, उसी तरह अब एक पारदर्शिता कानून की जरूरत है ताकि यह देश और अधिक खत्म होने से बचे। यह एक अलग बात है कि किसी पार्टी के प्रवक्ता के सार्वजनिक बयान से उस पार्टी के नेताओं के घिरने का खतरा होने पर पार्टी नोटिस जारी कर सकती है, लेकिन हम पार्टियों की आंतरिक सहूलियत से परे जाकर यह व्यापक लोकतांत्रिक मांग कर रहे हैं जिसके पक्ष में सोशल मीडिया के रास्ते एक जनमत तैयार करने की कोशिश होनी चाहिए। हम किसी व्यक्ति से नार्को टेस्ट में ऐसे सवाल पूछने की सिफारिश नहीं कर रहे हैं कि वे पिछली रात कहां थे, लेकिन किसी भ्रष्टाचार या जुर्म में उनकी क्या भूमिका है, इस बात को लेकर उन्हें लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।

