चीन का एआई फैसला, भारत के लिए सबक

NFA@0298
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हाल ही में चीन की अदालतों ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जो वैश्विक स्तर पर एआई युग में श्रम अधिकारों की चर्चा को नई दिशा दे रहा है। हांगझोऊ इंटरमीडिएट पीपुल्स कोर्ट और बीजिंग की अदालतों ने साफ किया कि कंपनियां कर्मचारियों को एआई से बदलकर बर्खास्त नहीं कर सकतीं। अदालतों का तर्क था कि एआई अपनाना कंपनियों का स्वैच्छिक व्यावसायिक निर्णय है, न कि कोई अप्रत्याशित या अनियंत्रणीय परिस्थिति जो अनुबंध समाप्त करने का आधार बने।

भारत के लिए यह नजीर बेहद प्रासंगिक है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश के रूप में भारत में करोड़ों युवा नौकरी में हैं साथ ही तलाश में हैं। आईटी और आईटीईएस सेक्टर, जो लाखों युवाओं को रोजगार देता रहा है, एआई के सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में है। कंपनियां जेनेरेटिव एआई का इस्तेमाल करके कोडिंग, टेस्टिंग और रूटीन टास्क्स को ऑटोमेट कर रही हैं। इससे कर्मचारियों में असुरक्षा का माहौल है, नौकरी जाने का डर, सैलरी में कटौती और भविष्य को लेकर चिंता हैं।

नोएडा में टेक्‍सटाइल सेक्‍टर के मजदूरों का सैलरी बढ़ाने को लेकर हुआ हालिया प्रदर्शन इसी चिंता का प्रतीक हैं। भारत सरकार ने हाल ही में चार नए श्रम कानून लागू किए हैं, जिनका व्यापक विरोध हुआ।

चीन तकनीक के मामले में दुनिया में अ्ग्रणी है। अदालत यह फैसला बताता है कि वहां भी लागत कम करने और मुनाफा बढ़ाने के लिए कंपनियां एआई का बड़े पैमाने पर सहारा ले रही हैं। यह तब है जब चीन दुनिया की बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में शामिल है।

यह संकेत भारत की सरकार के लिए भी साफ है कि यहां के कार्पोरेट अपने कर्मचारियों के हितों का ध्‍यान रखें, ऐसे कानूनों का सख्‍ती से अमल हो। कंपनियों को एआई अपनाने से पहले कर्मचारियों के लिए रीस्किलिंग प्रोग्राम अनिवार्य करना चाहिए। लेबर कोड्स में एआई से संबंधित प्रावधान जोड़े जाएं, जैसे उचित नोटिस, मुआवजा और ट्रेनिंग का अधिकार?

सरकार, उद्योग और यूनियनों को मिलकर एक संतुलित रणनीति बनानी होगी। एआई को अवसर के रूप में देखा जाए न कि सिर्फ लागत कटौती का हथियार। स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स को तेज किया जाए, खासकर आईटी, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में। शिक्षा प्रणाली को भविष्‍य को ध्‍यान बनाना होगा।

एआई प्रगति को रोकना संभव नहीं, न ही चाहिए। लेकिन प्रगति मानवीय मूल्यों के साथ हो। चीन ने मजदूर हितों को प्राथमिकता देकर एक मिसाल कायम की है। भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा और विशाल युवा शक्ति के साथ, बेहतर मॉडल बना सकता है। जहां नवाचार और रोजगार साथ-साथ चलें। यदि हम सही नीतियां बनाते हैं तो एआई भारत को वैश्विक लीडर बना सकता है, वरना यह असमानता और बेरोजगारी बढ़ाएगा।

समय आ गया है कि श्रम कानूनों पर नए सिरे से विचार किया जाए। नौकरी के साथ साथ सुरक्षा और न्याय भी सुनिश्चित हो। यह सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक स्थिरता का सवाल है।



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