छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय में साहित्य अकादमी के साथ मिलकर किए जा रहे एक कार्यक्रम में देश के जाने माने लेखक मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल द्वारा की गई बदसलूकी जितनी शर्मनाक है, उतना ही यह देखना तकलीफदेह है कि इस घटना के बावजूद वहां देश के अनेक साहित्यकार मूक दर्शक बने बैठे रहे।
यह दर्ज किया जाना चाहिए कि विश्वविद्यालय में ‘समकालीन हिंदी कहानीः बदलते जीवन संदर्भ’ विषय पर केंद्रित इस संवाद का आयोजन साहित्य अकादमी की संयुक्त मेजबानी में किया गया था। इसमें मनोज रूपड़ा के साथ ही महेश कटारे और जया जादवानी सहित अनेक कथाकार वक्ता के बतौर आमंत्रित थे।
याद नहीं पड़ता कि आलोक कुमार चक्रवाल का हिंदी साहित्य से कोई खास लेना-देना है। जाहिर है, विश्वविद्यालय के प्रमुख के नाते वह इस आयोजन को संबोधित कर रहे थे और उनसे यह अपेक्षा भी नहीं थी कि वह समकालीन कहानी पर कुछ कहेंगे। लेकिन कुलपति पद की गरिमा के उलट जब वह हलके-फुलके अंदाज में अपनी बात रख रहे थे, और खुद उन्होंने जब रूपड़ा से जानना चाहा कि वह बोर तो नहीं हो रहे हैं, तो इसके जवाब में जो कुछ हुआ, वह शर्मसार करने वाला है। मनोज रूपड़ा ने कुलपति से कहा कि वह विषय पर नहीं बोल रहे हैं, इससे नाराज कुलपति ने उन्हें बेहद अपमानित कर सभागार से ही बाहर जाने के लिए कह दिया!
हैरत की बात है कि कुलपति के इस मनमाने रवैया का सभागार में मौजूद किसी व्यक्ति ने प्रतिकार नहीं किया, जबकि वहां देश के अनेक जाने-माने कथाकार मौजूद थे। यहां तक कि इसकी सहआयोजक साहित्य अकादमी की ओर से भी अपने एक मेहमान लेखक के अपमान का प्रतिकार नहीं किया गया है।
वैसे खुद साहित्य अकादमी जिस दुर्दशा को प्राप्त हो चुकी है, उससे यह अपेक्षा करना बेकार है। दरअसल चिंता की बात है कि जिस साहित्य अकादमी पर हिंदी ही नहीं, बल्कि देश का सारी भाषाओं के साहित्य को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है, उसके एक आयोजन में एक कुलपति चुटकुला सुनाते हुए एक लेखक का अपमान कर देता है।
दरअसल केंद्रीय गुरुघासीदास विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ है, वह देश में लगातार हो रहे संस्थागत क्षरण को ही दिखा रहा है। यह दिखा रहा है कि विश्व गुरु बनने का दावा करने वाले देश में शिक्षा के उच्च संस्थान और साहित्य से जुड़े केंद्र किस तरह से स्वतंत्र चिंतनशील माहौल बनाने के बजाए कुंठित और अज्ञानी लोगों की मनमानी का केंद्र बन गए हैं।
यह उम्मीद करना तो बेकार ही है कि कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल से किसी तरह की सफाई भी मांगी जाएगी। आखिर इस दौर में वह इस तरह के अकेले कुलपति नहीं हैं, जिनकी अज्ञानता और अहंकार सार्वजनिक नहीं हैं। दरअसल उम्मीद साहित्य और समाज से जुड़े सुचिंतित लोगों से है कि क्या वे अपनी जिम्मेदारियां भूल चुके हैं? क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि हमारे यहां स्कूलों में दशकों से पढ़ाया जाता रहा है कि साहित्य ही समाज का दर्पण है?

