सिग्मंड फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धांत में ‘कुंठा’ को मानसिक ऊर्जा के प्रवाह में रुकावट के रूप में देखा जाता है। इस सिद्धांत के मुताबिक, मानव व्यवहार अचेतन इच्छाओं और संघर्षों से प्रभावित होता है, जिसमें व्यक्तित्व को पहचान (आईडी), अहंकार (ईगो), और परा-अहंकार (सुपर ईगो) में बांटा गया है।
मन के तीन स्तर बताए गए हैं- चेतन, अर्धचेतन, अचेतन। कुंठा, असफलता या बाधा से उत्पन्न होने वाली एक मानसिक स्थिति को दर्शाती है, जिसे अंग्रेजी में “फ्रस्ट्रैशन” कहते हैं। जब उम्मीदें-इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, तो मन में निराशा, हताशा, खीझ, चिढ़ या एक किस्म की “कुंठा” जगह बना लेती है।

बुधवार (31 दिसंबर 2025) की रात देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में जब मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने ‘एनडीटीवी’ के अनुराग द्वारी के सवालों के जवाब में खास भाव भंगिमाओं के साथ “घंटा” शब्द का इस्तेमाल किया, तो कई को फ्रायड के सिद्धांत याद आ गए। कहा जा रहा है कि देश-दुनिया में बीजेपी की किरकिरी करवाने वाले इस अप्रिय प्रसंग के लिए विजयवर्गीय ने चूंकि उसी रात क्षमा याचना कर ली, लिहाजा बजाय इसके उस ‘मानसिक ग्रंथि’ अथवा ‘राजनीतिक कुंठा’ की चर्चा ज़्यादा प्रासंगिक है, जिसने इन दिनों बीजेपी के ज्यादातर नेताओं को अपना शिकार बना रखा है।
मगर ताज़ा एपिसोड के मद्देनज़र बात सिर्फ विजयवर्गीय की करें तो वह पिछले 50 वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं। 1975 में जब मोहन यादव 10 साल के रहे होंगे, तब इंदौर का यह ‘सबसे बड़ा नेता’ आरएसएस की छात्र विंग एबीवीपी से जुड़ चुका था। 1990 में शिवराज सिंह चौहान, बृजमोहन अग्रवाल, प्रेम प्रकाश पांडे के साथ विधानसभा में प्रवेश किया था। जाहिर है, कई स्वाभाविक-अस्वाभाविक महत्वाकांक्षाएं रही होंगी। मुख्यमंत्री बनने की भी।
आखिर, उनके समकालीन शिवराज 17 साल मुख्यमंत्री रहे ही। विजयवर्गीय में क्या कमी थी? लेकिन उनको पार्टी यहां से वहां भटकाती रही। 2023 में चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं थी, मगर बेटे का टिकट काटकर उन्हें चुनाव लड़ाया जाता है। 2013 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ने वाले मोहन यादव रातोंरात उनके “बॉस” हो जाते हैं। उन्हें यादव के अधीन मंत्री बनना पड़ता है। इसके बाद इंदौर का प्रभार मुख्यमंत्री स्वयं अपने पास रख लेते हैं।
बीजेपी में ‘ताई-भाई’ (सुमित्रा महाजन-विजयवर्गीय) की प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर रही है। ताई के घर बैठने के बाद लगा था कि “मिनी मुम्बई” में सिर्फ ‘भाई’ की धारा ही बहेगी। मगर, हुआ इसके विपरीत। अधिकारी राजपत्र देखकर काम करते हैं और उसमें इंदौर का प्रभार मुख्यमंत्री के खाते में दर्ज था।
जाहिर है, इसके बाद इंदौर में भाजपा की सियासत ‘टर्न’ ले लेती है। हालत यह हो जाती है कि पार्टी संगठन में इंदौर के चेहरों की नियुक्तियां होती हैं पर विजयवर्गीय के पास सही खबर तक नहीं रहती। अधिकारी मुख्यमंत्री के नाम से उनको ‘चमकाने’ लगते हैं। अब, इन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच उनके विधानसभा क्षेत्र की ही बस्ती भागीरथपुरा में एक त्रासदी होती है। संयोग से त्रासदी का संबंध भी उसी विभाग से होता है, जिसके मंत्री विजयवर्गीय हैं।
यानी, जिम्मेदारी और जवाबदेही के लिहाज से वे ही सवालों के घेरे में भी होते हैं। और, ऐसे गिरते राजनीतिक सेंसेक्स के बीच “घंटा” भी उन्हीं के मुंह से निकलता है। इत्तिफ़ाक़ से वो ‘घंटा’, जिसे मोहन यादव की वैदिक घड़ी में खास स्थान हासिल नहीं है। विक्रमादित्य वैदिक घड़ी, जो श्यामला हिल्स स्थित सीएम हाउस में स्थापित है, “घंटा” के बजाय “मुहूर्त” को मानती है। एक दिन में 30 मुहूर्त होते हैं। 48 मिनट का एक मुहूर्त होता है। मतलब इसमें “घंटे” की कोई जगह नहीं…!
मोहन प्रभारी…टारगेट पर कैलाश

2017-2018 में मप्र प्रदूषण निवारण मंडल ने पीने के पानी के 60 में से 59 सैंपलों को फेल बताया था। यानी पानी संदूषित पाया गया था। लेकिन, इंदौर की मेयर इन काउंसिल ने साफ पेयजल आपूर्ति के लिए नई पाइप लाइन बिछाने का प्रस्ताव चार साल बाद, 2022 में पारित किया। और अब 2026 में 21 लोगों की मौत हो गई। तो, सवाल है कि सरकार की ये तमाम एजेंसियां तब से कर क्या रही थीं?
पानी की लाइनों के लिए क्यों पैसा नहीं दिया गया? पीने के पानी में मल-मूत्र क्यों मिलने दिया गया? लोगों की जान की चिंता क्यों नहीं की गई? ऐसा साफ शहर किस काम का, जहां लोगों को “विष्ठा” जल पीकर मरने के लिए छोड़ दिया गया? इंदौर हाईकोर्ट ने भी कहा, “अपने रहवासियों को जहरीला पानी उपलब्ध कराने के लिए देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में इंदौर की छवि को गहरा नुकसान हुआ है।”
दरअसल, पूरा खेल “समय” का है। वर्ना न तो कैलाश इंदौर के प्रभारी मंत्री हैं, न महापौर, न कलेक्टर, न नगर निगम आयुक्त, न महापौर परिषद। लेकिन, सबके टारगेट पर वे ही हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी मुख्यमंत्री मोहन यादव, जो शहर के प्रभारी भी हैं, की बनिस्बत विजयवर्गीय पर ज्यादा फोकस कर रही है।
इतना ही नहीं, बीजेपी के भीतर भी एक वर्ग कैलाश को निशाने पर लेने में लगा है। इसकी एक वजह यह है कि कैलाश दिसंबर 2023 से नगरीय प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यदि उनके संज्ञान में यह समस्या थी, तो दो साल से वे कुछ क्यों नहीं कर पाए? किसने उनके हाथ बांध रखे थे? नई पाइप लाइन बिछाने के लिए कौन उनको रोक रहा था? कौनसी ताकत उन्हें लाचार बनाकर रखे हुए थी?
यही कारण है कि पार्टी का कोई बड़ा नेता उनके समर्थन में सामने नहीं आया। सिवाय भाजपा के मौजूदा सियासी समीकरणों को समझने वाले पूर्व क्षेत्रीय संगठन मंत्री मेघराज जैन के, जिन्होंने सोशल मीडिया पर खुलकर उनके समर्थन में लिखा-“कैलाश विजयवर्गीय पार्षद से मंत्री और राष्ट्रीय राजनीति तक ऐसे ही नहीं पहुंचे। खूब पापड़ और बड़े संघर्ष से अपनी जगह बनाई है। परेशानी में मुंह से कोई शब्द (घंटा) निकल गया तो तुरंत क्षमा मांगकर खेद जताया। फिर भी तिल का ताड़ बनाना, मानो, संसार में ऐसी दुखद घटना पहली बार घटी हो।”
21 मौतें…पर ‘बेबी को बेस पसंद है’
भाजपा के अंदर एक वर्ग “कार्रवाई” के लिए दबाव जरूर बना रहा था, क्योंकि घटना बड़ी है और ट्रिपल इंजन की सरकार है। नीचे से ऊपर तक सब भाजपा का है। अब तक 21 निर्दोषों की जान जा चुकी है। कई अभी भी बीमार हैं। लिहाजा, एक-दो इस्तीफे का दबाव बनाया गया। कहा गया कि किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं करने या किसी को सजा योग्य न पाने से गलत संदेश जाएगा।
मगर फिर तर्क दिया गया कि पार्टी में इस्तीफे की परंपरा नहीं है। यदि परंपरा होती तो तीन माह पहले जब जहरीले कफ सीरप से 24 बच्चों की असामयिक मौतें हुई थीं, तब ही विभाग के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल से नहीं मांग लिया जाता। जैसे कफ सीरप मामले में उच्च स्तर पर किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई और कुछ दिन के शोर-शराबे के बाद सब रूटीन में चालू हो गया, वैसे ही भागीरथपुरा को भी भूल जाएंगे लोग।
तर्क देने वाले इस सूची में ढाई साल पहले इसी इंदौर में रामनवमी पर हुए बावड़ी हादसे को भी गिनाते हैं, जिसमें 36 लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन आज तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई। न ही किसी ने ली। और पीछे जाएं तो पेटलावद (झाबुआ) में खनन विस्फोटकों में ब्लास्ट हो गया था। 100 से ज़्यादा मरे थे।
हरदा में बड़ी ट्रेन दुर्घटना हुई थी। कहते हैं, बैक वाटर पटरियों पर आ गया था। दो ट्रेनें कामायनी और जनता एक्सप्रेस एक-दूसरे पर चढ़ गई थीं। 28 यात्री मरे थे और 100 से ज्यादा को शारीरिक नुकसान हुआ था। दोनों मामलों में क्या हुआ? कुछ नहीं। बस, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को रात भर नींद नहीं आई थी!
उनके 17 साल के कार्यकाल में इस तरह के और भी कांड-मामले (व्यापम सरीखे) हुए, लेकिन भाजपा की “चुनावी सेहत” पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। उसे वोट मिलते रहे और मिल रहे हैं। लिहाजा, इस्तीफे वगैरह की बातें कोरी कयासबाजी है। इंदौर में पार्टी के नेता “असली रूटीन” की तरफ लौट रहे हैं।
भंडारे और धार्मिक यात्राएं चालू हो गई हैं। नरेंद्र मोदी के साथ पतंग उड़ाने वाले सलमान खान की एक फिल्म आई थी-‘सुल्तान।’ इसमें एक गाना था-“बेबी को बेस पसंद है।” चाहे जितने मर-खप जाएं…क्या फ़र्क पड़ता है। क्यूंकि…’बेस’ जो पसंद है बेबी को!
दिल्ली पहुंचाई असलियत, इंतज़ार उत्तरायण का

मोहन यादव सरकार को दो साल हो चुके हैं। पार्टी में नीचे तक यह परसेप्शन (अवधारणा) बना है कि पूरा सिस्टम नौकरशाही चला रही है। नेताओं-कार्यकर्ताओं के काम नहीं हो रहे। सुनवाई नहीं हो रही। भागीरथपुरा त्रासदी के बाद कैलाश विजयवर्गीय को दिल्ली बुलाया गया था। सुना है विजयवर्गीय और पार्टी के कुछ दूसरे नेताओं ने दिल्ली को “असलियत” से अवगत कराया है।
हालांकि, पार्टी ने “संवाद” नामक एक कवायद शुरू की है, जिसके तहत सरकार के मंत्री बारी-बारी से प्रदेश कार्यालय में बैठकर कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनना प्रारंभ किया है। दरअसल, मौजूदा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को हर तरफ से यह पता चल रहा था कि “सरकार के स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है।”
अधिकारियों के मन में जो आ रहा है, वो कर रहे हैं। भिंड के कलेक्टर और भाजपा विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह के बीच “मुक्का” विवाद को ज्यादा समय नहीं हुआ है। विजयवर्गीय ने सीएम मोहन यादव से कहा ही था कि वन विभाग पौध रोपण अभियान में सहयोग नहीं कर रहा है। नशे के कारोबार पर भी उन्होंने सवाल उठाए थे।
मुरैना के सांसद शिवमंगल सिंह तोमर ने हाल ही में एक महिला अधिकारी को ढीठ कहा था। राजगढ़ के सांसद रोडमल नागर तो इतने असहाय हो गए कि जल जीवन मिशन और जल निगम के अफसरों के पैरों में गिर पड़े। उनके चरण छुए। इतना ही नहीं, अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के हाथों जेपी नड्डा को नकली बाग प्रिंट के गमछे दिलवा दिए।
और, नरसिंहपुर में जिला पंचायत के सीईओ गजेंद्र नागेश ने एक युवक को तमाचे जड़ दिए। बहरहाल, “फ्रस्ट्रैशन” नीचे तक है। अब इंतज़ार 14 जनवरी का है, जब सूर्य देव धनु राशि से मकर में प्रवेश कर उत्तरायण होंगे। उम्मीद की जा रही है कि इसी के साथ निगम-मंडलों में नियुक्तियों का सिलसिला शुरू होगा। कुछ को मंत्रिमंडल में भी उठापटक की अपेक्षा है।

