ओडिशा से आई हथिनी की मौत, सात दिन तक चला इलाज, उम्मीदों से भरा संघर्ष जारी रहा, आख़िरी सांस तक जुटा रहा वन अमला—DFO बोले, जान की बाज़ी लगी, पर किस्मत ने साथ नहीं दिया।

NFA@0298
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गरियाबंद।

वन्यजीव संरक्षण के लिए दिन-रात संघर्ष करने वाली वन विभाग की टीम की तमाम कोशिशों के बावजूद एक बीमार हथिनी को नहीं बचाया जा सका। ओडिशा से भटक कर आई लगभग 10–12 वर्ष की हथिनी ने सात दिनों तक चले गहन इलाज के बाद आज सुबह अंतिम सांस ली।

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इस दुखद खबर की जानकारी स्वयं डीएफओ वरुण जैन ने सोशल मीडिया के माध्यम से साझा की। उन्होंने बताया कि 22 दिसंबर को यूएसटीआर स्टाफ को हथिनी की गंभीर स्थिति का पता चला था। वह न तो ठीक से खा पा रही थी और न ही मल त्याग कर पा रही थी, जिससे उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी।

हथिनी को गरियाबंद और धमतरी होते हुए यूएसटीआर लाया गया, जहां पिछले सात दिनों से वन विभाग की टीम लगातार उसकी जान बचाने में जुटी रही। इलाज के दौरान कुछ समय के लिए उम्मीद भी जगी—हथिनी ने मल त्याग शुरू किया और थोड़ा भोजन भी करने लगी। लेकिन 15 जनवरी को अचानक उसकी तबीयत फिर बिगड़ गई।

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इलाज में जंगल सफारी और कानन पेंडारी चिड़ियाघर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की भी मदद ली गई, पर तमाम प्रयासों के बावजूद हथिनी को बचाया नहीं जा सका।

डीएफओ वरुण जैन ने बताया कि इससे पहले सितंबर 2025 में इसी तरह की गंभीर बीमारी से पीड़ित एक नर हाथी को सफलतापूर्वक बचाया गया था। उन्होंने कहा कि वन विभाग की प्राथमिकता हमेशा वन्यजीवों की सुरक्षा और संरक्षण रही है।

गौरतलब है कि डीएफओ वरुण जैन लगातार वन्य प्राणियों और वन संपदा की हिफाज़त में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। इससे पहले भी उनके नेतृत्व में बीमार हाथियों का इलाज, तेंदुए के रेस्क्यू और उपचार के बाद उन्हें सुरक्षित जंगल में छोड़ा जा चुका है।

हथिनी की मौत भले ही वन विभाग के लिए एक पीड़ादायक क्षण है, लेकिन यह घटना इस बात की गवाही भी देती है कि वन अमला किस तरह अपनी जान की परवाह किए बिना वन्यजीवों को बचाने के लिए समर्पित रहता है।



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