Veerendra Yadav की आखिरी पोस्ट बिलासपुर के कुलपति पर

NFA@0298
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रायपुर। देश के जाने–माने आलोचक वीरेंद्र यादव (Veerendra Yadav) ने शुक्रवार को अंतिम सांसें लीं।उनके निधन से देश के हिंदी जगत में शोक की लहर दौड़ गई। इस बीच वीरेंद्र यादव की आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा में है।यह पोस्ट बिलासपुर के संत गुरु घासीदास विश्विद्यालय में घटी उस घटना को लेकर है जिसमें इस विश्विद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने भरी सभा में वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा को अपमानित किया और सभागार से बाहर कर दिया।इस घटना की देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई।देश के दिग्गज बुद्धिजीवियों ने इस घटना के खिलाफ अलग–अलग मंचों पर लिखा,बोला।लोग सड़क पर भी उतरे।

वीरेंद्र यादव ने भी इस घटना के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिखा और यही उनकी आखिरी पोस्ट थी।

उन्होंने इस घटना पर टिप्पणी की – ‘यह लेखकीय अस्मिता पर हमला है।’उन्होंने जो लिखा उसे पढ़ें –‘ शर्मनाक था वह दृश्य! कुलपति सर्व शक्तिमान था, उसने वही किया जो अविवेकी सत्ता अक्सर करती है. उसने यह विवेक खो दिया था कि यह उसका अंत:पुर न होकर विश्वविद्यालय का सभागार था, जहाँ उसके मातहतों के अलावा साहित्य समाज के लेखक भी आमंत्रित थे. वह पूरी झोंक में बेपर की उड़ाए हुए था. फिर उसे लगा कि सामने बैठा एक लेखकनुमा व्यक्ति उनकी बातों पर यथोचित ध्यान नहीं दे रहा है. उन्होंने उससे पूछ ही लिया कि ‘आप बोर तो नहीं हो रहे हँ.?’ अब जिनसे पूछा था वह सचमुच गंभीर लेखक थे, शालीनता बरकरार रखते हुए उन्होंने बस इतना ही कहा कि’ विषय पर आईये’. इतने मात्र से कुलपति का पारा आसमान पर पहुँच गया. उन्होंने वही किया जो वे कर सकते थे, यानि मनोज रूपड़ा को सभा निकाला देने के साथ दुबारा न बुलाये जाने का हुक्मनामा भी सुना दिया गया. इस सबके बावजूद हिंदी संसार के कुछ देदीप्यमान सितारे अविचलित व अविराम सभागार में बने रहे .

सभा फिर जुटी कुलपति फिर पूरे अंदाज़ में बोले. अन्य आमंत्रित प्रतिभागी लेखकों ने अपनी गुरुत्तर भूमिका का निर्वहन किया. इस आश्वस्ति के साथ कि वे अनुशासित लेखकों की तरह अन्य आयोजनों में ससम्मान बुलाये जाते रहेंगें. यह समय किसी को कुछ याद दिलाने, सामाजिक भूमिका निभाने और सत्ता के समक्ष रीढ़ सीधे रखने का विनम्र सुझाव देने का भी नहीं है. यह समय इस दृश्य के दृष्टा होने से उपजी शर्म में डूब जाने का है. यह मनोज रूपड़ा का अपमान नहीं, यह लेखकीय अस्मिता पर हमला है. अफसोस कि इस दौर में कुछ लेखक भी इसके सहभागी हैं और हम जैसे कुछ इसके विवश दर्शक! ’



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