Shree Cement Plant के खिलाफ उमड़े जन सैलाब से प्रशासन झुका

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले में प्रस्तावित श्री सीमेंट प्लांट की संडी चूना पत्थर खदान परियोजना के खिलाफ उठा जनआक्रोश आखिरकार रंग ले आया। ग्रामीणों के अभूतपूर्व आंदोलन और लगातार दबाव के बाद कलेक्टर कार्यालय ने 11 दिसंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई स्थगित करने का आदेश जारी कर दिया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब शनिवार को 200 से अधिक ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ किसानों, महिलाओं और युवाओं ने सड़कों पर उतरकर प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया था।

इस पूरे आंदोलन को The Lens ने अपने सभी प्लेटफॉर्म में लगातार प्रमुखता से प्रकाशित और प्रसारित किया। हमने अपने सभी प्लेटफॉर्म के जरिए फैक्ट्री प्रभावित गांवों की जमीनी हालात को सामने रखा।

लगातार रिपोर्टिंग और वीडियो कवरेज के चलते प्रशासन पर दबाव बढ़ता गया। आखिरकार कलेक्टर की ओर से जनसुनवाई स्थगित करने का आदेश जारी कर दिया गया।

जनसुनवाई के खिलाफ 6 दिसंबर को आसपास के 39 गांवों 10 किलोमीटर के दायरे के गांवों में आंदोलन की लहर दौड़ गई। देखते ही देखते ट्रैक्टर-ट्रॉलियों का विशाल काफिला छुईखदान की ओर बढ़ पड़ा।

ग्रामीणों की भागीदारी ने यह साफ कर दिया कि यह विरोध किसी एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के अस्तित्व की लड़ाई है।

छुईखदान सीमा पर पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग कर रैली को रोकने की कोशिश की, लेकिन जब काफिला नहीं रुका तो ग्रामीण ट्रैक्टर छोड़ पैदल मार्च करते हुए SDM कार्यालय पहुंच गए और परिसर को घेर लिया।

SDM कार्यालय में जोरदार नारेबाजी के बीच ग्रामीणों ने ज्ञापन सौंपा और 11 दिसंबर की जनसुनवाई रद्द करने की दो-टूक मांग रखी।

इसके बाद आक्रोश और बढ़ा और राजनांदगांव–कवर्धा मुख्य मार्ग पर विशाल जाम लगा दिया गया।

पुलिस द्वारा सड़क खुलवाने की कोशिश के दौरान हालात बेकाबू हो गए। किसानों और पुलिस के बीच झड़प हुई, लाठीचार्ज किया गया, बैरिकेड तोड़े गए और इलाके में देर तक तनाव बना रहा।

ग्रामीणों का कहना है कि यह विरोध अचानक नहीं है। 39 गांवों की ग्रामसभाएं पहले ही लिखित रूप से परियोजना को खारिज कर चुकी हैं। संडी, पंडारिया, विचारपुर और भरदागोड़ पंचायतों में पारित प्रस्तावों में साफ लिखा गया है कि जमीन, जंगल और जलस्रोत हमारी जीवनरेखा हैं। इन्हें किसी भी कीमत पर खदान के लिए नहीं सौंपेंगे।

ग्रामीणों का आरोप है कि खदान और सीमेंट संयंत्र से फैलने वाला धूल प्रदूषण खेती को बंजर कर देगा और पूरे इलाके का जीवन तबाह हो जाएगा।

इस जनसुनवाई को टाले जाने के बाद ग्रामीणों ने साफ किया है कि यह फैसला अंत नहीं, सिर्फ शुरुआत है। अब गांव-गांव बैठकें होंगी, जनजागरण अभियान तेज होगा और प्रशासन पर निगरानी रखी जाएगी।

ग्रामीणों का साफ संदेश है कि यह लड़ाई अस्तित्व की है। जमीन और पानी बचाने की है। यह संघर्ष अब रुकने वाला नहीं है।

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