PRSU विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भर्ती पर सवाल

NFA@0298
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रायपुर। छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठित पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (PRSU) में एक बार फिर भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। एम.टेक. ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स एंड लेजर टेक्नोलॉजी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए जारी की गई चयन सूची पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में एआईसीटीई (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) और यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के नियमों की अनदेखी की गई है। 2023 में निकली इन दो पदों (एक एसोसिएट प्रोफेसर और एक असिस्टेंट प्रोफेसर) की भर्ती का फाइनल लिस्ट 9 जनवरी 2026 को जारी हुआ, लेकिन इसमें योग्यता मानकों में भेदभाव और पक्षपात के आरोप लगाए जा रहे हैं।

विश्वविद्यालय ने 7 जनवरी 2026 को अधिसूचना नंबर 237 जारी की, जिसमें एसओएस इन इनोवेटिव प्रोग्राम के तहत इस विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए योग्य उम्मीदवारों की सूची दी गई है लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सूची नियमों से खिलवाड़ करती नजर आती है। खासकर एम.एससी. इलेक्ट्रॉनिक्स वाले उम्मीदवारों को योग्य माना गया जबकि एम.एससी. फिजिक्स वाले कई आवेदकों को अयोग्य करार दिया गया। यह फैसला न सिर्फ असंगत लगता है, बल्कि इससे कुछ खास उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाने की आशंका जताई जा रही है।

नियमों में क्या कमी बताई जा रही है?

एआईसीटीई के नियमों के अनुसार, एम.टेक. प्रोग्राम के लिए फैकल्टी सदस्यों के पास संबंधित विषय में एम.टेक. या उसके बराबर डिग्री होना जरूरी है। एआईसीटीई की अप्रूवल प्रोसेस हैंडबुक में साफ लिखा है कि फैकल्टी के पास रिलेवेंट स्पेशलाइजेशन में मास्टर्स डिग्री होनी चाहिए। लेकिन यहां एम.एससी. इलेक्ट्रॉनिक्स को शामिल किया गया, जबकि ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स और लेजर टेक्नोलॉजी मुख्य रूप से फिजिक्स और फोटोनिक्स पर आधारित तकनीकी विषय है।

कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी जैसे अन्य संस्थानों के विज्ञापनों में भी इसी तरह की योग्यता मांगी जाती है, जहां मास्टर्स डिग्री में 55% अंक जरूरी होते हैं। यूजीसी के 2018 के नियमों में भी मास्टर्स डिग्री में कम से कम 55% अंक और रिलेवेंट सब्जेक्ट की शर्त है। एक पुराने यूजीसी पत्र (फरवरी 2007) में इस कोर्स को मंजूरी दी गई थी, जो इसे एक अलग विशेषज्ञता के रूप में मान्यता देता है।

विश्वविद्यालय के सूत्रों का कहना है कि अगर यूजीसी गाइडलाइंस का पालन किया जाता, तो एप्लाइड फिजिक्स और एप्लाइड इलेक्ट्रॉनिक्स दोनों को या तो शामिल किया जाता या दोनों को बाहर रखा जाता लेकिन यहां चुनिंदा तरीके से फैसले लिए गए लगते हैं।

पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप

सूची में दो उम्मीदवारों – डॉ. प्रफुल्ल कुमार व्यास (सीरियल नंबर 17, जन्मतिथि 15 जनवरी 1978) और डॉ. अंजली देशपांडे (सीरियल नंबर 2, जन्मतिथि 15 सितंबर 1972) को योग्य माना गया है। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों वर्तमान विभागाध्यक्ष डॉ. कविता ठाकुर के पूर्व रिसर्च स्कॉलर हैं। इससे हितों के टकराव का मामला बनता है, क्योंकि यूजीसी और एआईसीटीई के नियमों में साफ है कि चयन समिति में ऐसे सदस्य नहीं होने चाहिए जिनका उम्मीदवारों से सीधा संबंध हो। यह नैतिक उल्लंघन माना जा सकता है।

इसके अलावा, अयोग्य सूची में 6 आवेदकों को ‘विज्ञापित विषय में मास्टर्स डिग्री न होने’ का हवाला देकर बाहर किया गया। इनमें फिजिक्स वाले उम्मीदवार शामिल हैं, जबकि विषय की बुनियाद फिजिक्स ही है। एक और मुद्दा आयु सीमा का है – डॉ. अंजली देशपांडे की उम्र 53 साल से ज्यादा है जो आमतौर पर असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए तय ऊपरी सीमा (45-50 साल) से ऊपर है।

विश्वविद्यालय का पुराना इतिहास

पीआरएसयू में भर्ती से जुड़ी अनियमितताएं नई नहीं हैं। 2009 से ही यहां कोर्ट केस और चयन सूचियों में गड़बड़ी के आरोप लगते रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि अगर एआईसीटीई के सख्त नियमों का पालन किया जाता, तो सिर्फ एम.टेक. डिग्री वालों को ही प्रोफेसर बनने का मौका मिलता लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।

क्या हो सकते हैं नतीजे?

यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) का उल्लंघन मानी जा सकती है। एआईसीटीई एक्ट 1987 और यूजीसी एक्ट 1956 के तहत नियमों का पालन जरूरी है। अगर यह जारी रहा, तो कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है जो विश्वविद्यालय की साख को नुकसान पहुंचा सकता है।



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