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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के हफ्ते भर बाद प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध से उपजे हालात में देश के विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर चिंता जताई है और देशवासियों से मदद की अपील की है। रविवार को हैदराबाद में एक आम सभा को संबोधित करते हुए मोदी ने देशवासियों से कहा है कि वे पेट्रोल-डीजल के साथ ही खाने के तेल में कटौती करें, विदेश यात्राएं न करें और सालभर तक सोना न खरीदें! उन्होंने सड़क के बजाए रेलवे के जरिये माल ढुलाई और कोरोना महामारी के दौर की तरह वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने की बात भी की है।
प्रधानमंत्री मोदी के पूरे भाषण को सुनें, तो लगता है कि सरकार अचानक नींद से जाग गई है और अब उसे युद्ध की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे खतरे को लेकर चिंता सता रही है। वास्तविकता यही है कि उनकी यह अपील न केवल उनकी सरकार की ओर से देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर किए जाने वाले दावों के उलट है, बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि सरकार ने या तो नासमझी में या राजनीतिक कारणों से इन आशंकाओं को पांच राज्यों के चुनाव तक ढंके रखा।
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ईरान पर हमले के साथ ही जब होर्मुज जलडमरुमध्य बाधित हुआ था, तभी से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा मंडराने लगा था। भारत के लिए इस संकट के मायने पहले ही बेहद स्पष्ट थे, क्योंकि एक तो हम अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करते हैं और हमारे तेल का बड़ा हिस्सा होर्मुज के रास्ते से ही आता है।
ऐसे में सवाल तो यही है कि जब मोदी सरकार और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत बंगाल जीतने में लगा दी थी, तब क्या उसे एहसास नहीं था कि इन संसाधनों को बचाए रखना जरूरी है।
सरकार ने तीन महीने पहले अपना रोडमैप क्यों तैयार नहीं किया, जबकि इस बात की आशंका बराबर बनी हुई थी कि यदि युद्ध लंबा खिंचा, तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका बोझ बढ़ेगा? और फिर जिस तरह से सोने के दाम बढ़े हैं, और डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा था, वह तो सबके सामने है।
प्रधानमंत्री की अपील पर गौर करें, तो उसके विरोधाभासों को भी देखा जा सकता है। पहली बात मोदी सरकार का सारा जोर निजीकरण पर है और उसके कार्यकाल के दौरान सार्वजनिक उपक्रमों का बुरा हाल हुआ है। इसमें सार्वजनिक परिवहन को भी शुमार किया जा सकता है। बेशक इसमें राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी है, लेकिन हमारे देश में महानगरों को छोड दें तो बाकी शहरों में सार्वजनिक परिवहन का बुरा हाल है, लिहाजा लोगों को मजबूरन अपने काम पर अपने वाहन से जाना पड़ता है। फिर दूसरी ओर यह भी देखा जा सकता है कि किस तरह से कॉर्पोरेट जगत अपने निजी जेट पर उड़ान भर रहा है, जिसमें आयातित ईंधन की खासी खपत होती है। हवाई उड़ान तो वैसे भी आम आदमी से भी बहुत दूर है।
दरअसल प्रधानमंत्री की अपील का खासा असर उन लाखों गिग वर्कर्स पर पड़ सकता है, जो जान जोखिम में डालकर सर्विस सेक्टर का पहिया बने हुए हैं। प्रधानमंत्री को याद ही होगा कि मेक इन इंडिया के ऐलान के समय 2025 तक मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को जीडीपी के 25 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन आज वह 16 फीसदी के करीब है। कहने की जरूरत नहीं कि युद्ध ने उन कमजोरियों को उजागर कर दिया है, जिनका असर कई बरसों से देश की अर्थव्यवस्था पर पहले से पड़ रहा था। एक गड़बड़ी तो यह भी है कि हमारी अर्थव्यवस्था खपत आधारित है। जाहिर है, जब खपत कम होगी तो इसका असर मैन्यूफैक्चरिंग पर भी पड़ेगा और सर्विस सेक्टर पर भी।
प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी के दौरान शुरू की गई वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था को याद कर इसे बढ़ावा देने की अपील भी की है। लेकिन वर्क फ्रॉम होम की सुविधा एक सीमित क्षेत्र तक ही व्यावहारिक है, यह बताने की जरूरत नहीं है। आखिर उन करोड़ों मजदूरों को तो इस तपती मई में अपने काम के लिए बाहर निकलना ही पड़ेगा जिन पर देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की परोक्ष जिम्मेदारी है।
अब सोने की बात। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देशवासी सालभर तक सोना न खरीदें, क्योंकि इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। असल में हम सोना आयात करते हैं और इसमें विदेशी मुद्रा लगती है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार इसी साल फरवरी के 728 अरब डॉलर से घटकर 690 अरब डॉलर रह गया है। ऐसा एक दिन में तो नहीं हुआ है। तो क्या प्रधानमंत्री चुनावों के खत्म होने का इंतजार कर रहे थे?
· प्रधानमंत्री जानते ही होंगे कि सोना भारतीयों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा भी है। इसके अलावा सोने को भरोसेमंद निवेश भी माना जाता है। सोने के दाम जिस ऊंचाई पर हैं, वो तो वैसे भी आम आदमी से दूर है, लेकिन अभी शादी के मौसम में इसकी मांग रहती ही है। इसका एक और पहलू है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ऑल इंडिया जेम ऐंड जूलरी डोमेस्टिक काउंसिल के अध्यक्ष राजेश रोकड़े के मुताबिक गहने और जूलरी के विशाल क्षेत्र में एक करोड़ से ज्यादा लोग काम करते हैं, जिनमें कारीगर से लेकर शो रूम में काम करने वाले युवक युवतियां शामिल हैं। जाहिर है, गहने कम खरीदे जाएंगे तो इनके रोजगार पर असर पड़ेगा।
बेशक, युद्ध से उपजे हालात देश की अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक होने ही चाहिए। जरूरत इसके समय रहते तैयारी करने की थी। ऐसे संकट के समय फिजूलखर्ची रोकने और संयम की जरूरत से, कहां इनकार है। दरअसल इसकी मिसाल तो खुद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को देनी चाहिए। क्या प्रधानमंत्री मोदी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के मंत्रियों और भारी-भरकम सरकारी अमले के लिए कोई नियमावली जारी करेंगे, उनके खर्चों पर कोई पाबंदी लगाएंगे, ताकि फिजूलखर्ची रोकी जा सके?
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