NCERT Book Controversy:न्यायपालिका की साख

NFA@0298
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सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) द्वारा तैयार आठवीं कक्षा की समाज शास्त्र की पुस्तक में ‘न्यायिक भ्रष्टाचार’ शीर्षक से जुड़े अंश पर न केवल कड़ा एतराज किया है, बल्कि इस किताब पर ही रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि यह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस आक्रामक तेवर ने मोदी सरकार को असहज कर दिया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तुरंत न केवल सफाई दी है, बल्कि बताया है कि एनसीईआरटी को सारी किताबें वापस मंगाने के निर्देश दे दिए गए हैं।

बात यहीं नहीं रुकी है। जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इसे सोची समझी साजिश करार दिया है और उन अधिकारियों को तलब किया है, जिन्होंने यह अध्याय तैयार करवाया और मंजूरी दी।

जाहिर है, न्यायपालिका का एक कड़ा रुख सरकार को नतमस्तक कर सकता है। पहले एनसीईआरटी की बात। 1961 में स्थापित यह स्वायत्त संस्था स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए नीतियां बनाती है और पाठ्य पुस्तकें प्रकाशित करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर एनसीआईआर के साथ ही सरकार को फटकरार लगाई है, और संभवतः इस तरह का यह पहला मामला है। मगर सवाल यही उठता है कि क्या यह इतनी बड़ी बात थी कि पूरी न्यायपालिका की साख दांव पर लग जाती?

निस्संदेह न्यायपालिका आज भी लोगों की आखिरी उम्मीद है और उसकी अपनी एक साख है। भारतीय न्यायपालिका की एक ऐतिहासिक परंपरा है, जिसने कई मुश्किल मौकों पर देश को राह दिखाई है, संविधान की रक्षा की है। मगर क्या यह सच नहीं है कि न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार की शिकायतों से बची नहीं है।

इसी साल लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2016 से 2025 के दौरान मौजूदा और पूर्व जजों के खिलाफ 8600 शिकायतें दर्ज की गईं। बेशक, इनमें सारी शिकायतें सीधे भ्रष्टाचार से जुड़ी नहीं होंगी। लेकिन क्या यह भूला जा सकता है कि राजधानी दिल्ली में ही एक जज के आवास से करोड़ों रुपये लावारिस हालत में मिले थे और यह मामला उनके खिलाफ महाभियोग चलाने तक जा पहुंचा है।

यही नहीं, पूरे देश की निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च अदालत तक 5.4 करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें ऐसे मामले भी हैं, जिनमें सुनवाई तक शुरू नहीं हो सकी है। बेशक, इसकी वजह न्यायपालिका और न्यायिक सेवा की रिक्तियां भी एक बड़ा कारण है। असल में न्याय सुगम हो सके यह एक बड़ी चिंता होनी चाहिए।

जहां तक भ्रष्टाचार की बात है, तो तकरीबन हर क्षेत्र में यह व्याप्त है। अच्छा होता कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कड़ा रुख दिखाते हुए भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए कोई पहल करता।



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