Middle East Crisis : ईरान-इजराइल युद्ध के कारण पश्चिम एशिया में शिपिंग और लॉजिस्टिक्स पूरी तरह बाधित हो गई है। इससे भारत के विभिन्न बंदरगाहों पर करीब 3,000 कंटेनरों में 60,000 मीट्रिक टन बासमती चावल फंसा हुआ है। निर्यातक इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार से तत्काल सहायता की मांग कर रहे हैं।
क्या है समस्या ?
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने जहाजों के रूट प्रभावित कर दिए हैं। जहाज अरब देशों के पूर्वी बंदरगाहों पर नहीं जा पा रहे हैं। नतीजा यह है कि निर्यात पूरी तरह रुक गया है और नए सौदे भी नहीं हो रहे। भारत अफ्रीका और पश्चिम एशिया को मिलाकर कुल चावल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा भेजता है।
पश्चिम एशिया में भारत का कुल चावल निर्यात का 90% हिस्सा बासमती चावल का है जिसकी सालाना कीमत करीब 25,000 करोड़ रुपये है। इस संकट से निर्यातकों का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
क्या है निर्यातकों की मुख्य मांगें ?
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने कृषि एवं प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) के चेयरमैन अभिषेक देव को पत्र लिखकर कई राहत उपायों की मांग की है। इस पत्र में मुख्य मांगें हैं –
- वर्तमान लॉजिस्टिक्स व्यवधान को फोर्स माज्योर (अप्रत्याशित परिस्थिति) के रूप में मान्यता दी जाए। इससे निर्यातकों पर अनुबंध तोड़ने, जुर्माना लगाने या कीमत कम करने का दबाव कम होगा।
- बंदरगाहों पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क (ग्राउंड रेंट, डेमुरेज आदि) में छूट दी जाए।
- ट्रांजिट में फंसे माल को वापस लाने, रूट बदलने या डायवर्ट करने में आसानी हो।
- कस्टम्स और RBI से दस्तावेज और भुगतान में सहूलियत।
- बैंकों से अस्थायी वर्किंग कैपिटल लिमिट और क्रेडिट बढ़ोतरी की मदद।
निर्यातकों ने क्या कहा?
इस मामले में निर्यातकों का कहना है कि रमजान के मौके पर व्यापार में बढ़ोतरी की उम्मीद थी लेकिन जहाज अरब देशों के पूर्वी बंदरगाहों की ओर नहीं जा पा रहे हैं। निर्यातकों का कहना है कि व्यापार का सबसे अच्छा समय (पीक सीजन) अब बीत चुका है और वर्तमान में बिक्री बहुत कम स्तर पर पहुंच गई है।
मुख्य दिक्कत कंटेनर और अन्य लॉजिस्टिक्स खर्चों में आई भारी बढ़ोतरी से है। बल्क रेट में लगभग 20% और कंटेनर फ्रेट रेट में 40% तक का इजाफा हुआ है जो इतना बड़ा है कि कोई भी निर्यातक इसे आसानी से नहीं सहन कर पा रहा है।
इस संकट से घरेलू बासमती चावल की कीमतों में पिछले 72 घंटों में 7-10% की गिरावट आई है। इससे निर्यातकों की वर्किंग कैपिटल (चालू पूंजी) पर और ज्यादा दबाव पड़ रहा है। निर्यातक अचानक बढ़ी फ्रेट, ईंधन और बीमा लागत को सहन नहीं कर पा रहे हैं, खासकर जब शिपमेंट देरी से हो रहे हैं या रद्द हो रहे हैं।
यह संकट अस्थायी माना जा रहा है लेकिन अगर युद्ध लंबा चला तो निर्यातकों और किसानों दोनों पर असर पड़ सकता है। सरकार से उम्मीद है कि जल्द ही कोई राहत पैकेज या अधिसूचना जारी होगी ताकि निर्यातक और किसान इस मुश्किल दौर से निकल सकें।


