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रायपुर। ‘बस्तर को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जो बाहर से लाकर उस पर रख दिया जाए, बल्कि ऐसा जो यहीं की मिट्टी से निकले, यहीं के लोगों की आकांक्षाओं से बने और यहीं के समाज की भागीदारी से आकार ले। बस्तर को कागजों, फाइलों और योजनाओं से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना हो तो उसके गांवों, उसके लोकविश्वास, उसकी निर्णय-प्रणाली और उसके सामाजिक ढांचे को समझना होगा।’
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तारण प्रकाश सिन्हा ने बस्तर के भविष्य को लेकर सोशल मीडिया पर एक लंबी और विचारोत्तेजक पोस्ट लिखी है। अपनी पोस्ट में उन्होंने बस्तर को केवल नक्सलवाद और संघर्ष के नजरिए से देखने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि बस्तर सिर्फ संघर्ष का भूगोल नहीं है, बल्कि वह सभ्यता, स्मृति, जंगल, जल, श्रम और समुदाय की जीवंत भूमि है।
उन्होंने लिखा कि दशकों तक बस्तर की पहचान बंदूक और असुरक्षा की खबरों तक सीमित कर दी गई, जबकि यहां का वास्तविक चेहरा कहीं अधिक गहरा और समृद्ध है। अब जब हालात बदल रहे हैं और भय का माहौल धीरे-धीरे खत्म हो रहा है, तब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बस्तर के विकास का रास्ता कैसा हो।
सिन्हा ने कहा कि बस्तर को समझने के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। यहां के गांव, लोकविश्वास, पारंपरिक निर्णय प्रणाली और सामाजिक संरचना को समझना जरूरी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बड़ेडोंगर की परंपरा का उल्लेख किया, जहां ‘लिमऊ राजा’ के प्रतीक के रूप में एक चट्टान पर बैठकर लोग सामूहिक निर्णय लेते हैं। उनके मुताबिक यह परंपरा बस्तर की सामुदायिक बुद्धि और सहभागिता आधारित व्यवस्था का उदाहरण है।
पोस्ट में उन्होंने बस्तर के कोसा वस्त्र को बड़ी आर्थिक संभावना बताया। उनका कहना है कि आज जब दुनिया प्राकृतिक और हस्तनिर्मित उत्पादों की ओर लौट रही है, तब बस्तर का कोसा केवल परंपरा नहीं बल्कि रोजगार, महिला सशक्तिकरण और वैश्विक बाजार से जुड़ने का अवसर बन सकता है। अगर इसे डिजाइन, ब्रांडिंग, गुणवत्ता और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए तो यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन सकता है।
उन्होंने ‘बांस तरी’ की लोकव्याख्या का जिक्र करते हुए कहा कि बस्तर में बांस की प्रचुरता है, लेकिन उससे जुड़ी उद्योग संभावनाओं का अभी पूरा उपयोग नहीं हो पाया है। उनके अनुसार बांस से फर्नीचर, घरेलू उत्पाद, सजावटी वस्तुएं, अगरबत्ती स्टिक, पैकेजिंग और निर्माण सामग्री जैसे कई छोटे-बड़े उद्योग विकसित किए जा सकते हैं।
सिन्हा ने बस्तर के हाट-बाजारों को केवल व्यापार का स्थान नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि यहां हाट में केवल खरीद-बिक्री नहीं होती, बल्कि सामाजिक संवाद, रिश्ते और सूचना का आदान-प्रदान भी होता है। इसलिए यदि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है तो हाट-बाजार व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
उन्होंने लिखा कि बस्तर जल संसाधनों की दृष्टि से भी बेहद संभावनाशील क्षेत्र है। पुराने तालाबों और जल संरचनाओं की परंपरा को पुनर्जीवित कर सिंचाई और मछली पालन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
खेती के संदर्भ में उन्होंने कोदो, कुटकी और रागी जैसे मिलेट्स को बस्तर की ताकत बताया और कहा कि उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार से जोड़ना भी जरूरी है।
महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी, साल बीज, इमली और लाख जैसे वन उत्पादों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अभी कच्चा माल बस्तर से बाहर जाता है और असली मुनाफा कहीं और बनता है। अगर इनका प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन बस्तर में ही हो, तो इसका सीधा लाभ स्थानीय समुदाय को मिलेगा।
पोस्ट के अंत में उन्होंने कहा कि बस्तर में विकास तभी सफल होगा जब गांवों को लाभार्थी नहीं बल्कि भागीदार माना जाएगा। ग्राम सभाओं, पारंपरिक संस्थाओं, महिला समूहों और स्थानीय उत्पादक समूहों को विकास प्रक्रिया के केंद्र में रखना होगा।
उन्होंने लिखा कि स्थायी शांति केवल सुरक्षा से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब समाज को लगे कि निर्णय में उसकी आवाज है और विकास में उसका सम्मान है।
सिन्हा के मुताबिक बस्तर इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है और यही वह समय है जब उसके विकास का रास्ता बहुत सोच-समझकर तय करना होगा—ऐसा रास्ता जो जल, जंगल, हाट, कोसा और समुदाय की भाषा को समझकर आगे बढ़े।
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