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यह कोई ऑप्टिकल इल्यूशन नहीं है कि विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करनेवाले भारत की अर्थव्यवस्था अब छठवे स्थान पर पहुँच गई है। बड़े ही जोर शोर से यह दावा किया जा रहा था कि भारत जीडीपी के मामले में विश्व की पांचवी सबसे बड़ी इकॉनमी तो बन ही चुका है और जल्दी ही एक पायदान ऊपर चढ़नेवाला है। लेकिन हो गया उल्टा। भारत एक पायदान ऊपर तो पहुंचा नहीं, बल्कि और एक पायदान नीचे गय। यह आंकड़ों की बाजीगरी जैसा प्रतीत होता है। कहा जा रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था ‘फिसल’ नहीं रही, बल्कि लंबी छलांग लगाने की तैयारी कर रही है।
आईएमएफ की अप्रैल 2026 की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउट लुक रिपोर्ट के अनुसार जीडीपी के आधार पर भारत एक पायदान नीचे गिरकर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत से बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश क्रमश: अमेरिका , चीन, जर्मनी, जापान और यूके हैं। भारत से आगे जापान और यूके हैं, इसलिए चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दावा अब नहीं हो सकता।
जीडीपी बताती है कि एक देश एक साल में कितना धन यानी सम्पदा पैदा कर रहा है। जितनी जीडीपी ज्यादा, देश उतना अमीर माना जाता है। बोलचाल की भाषा में समझाता हूँ कि जीडीपी का अर्थ क्या होता है? जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट्स , हिन्दी में सकल घरेलू उत्पाद। एक देश में एक साल के अंदर कुल जितना सामान बना या सेवाएं दी गईं, उसका कुल मूल्य। देश के अंदर जितनी भी चीजें उत्पादित की गई , जैसे कार, फोन, कपड़ा, गेहूं, दूध, मछली आदि सभी कुछ और इसके साथ ही जितनी भी सशुल्क सेवा दी गई वह भी। जैसे डॉक्टर या टीचर ने फीस ली, स्कूल या ट्यूशन फीस लगी, ट्रांसपोर्ट में किराया भाड़ा लगा, बैंक ने सेवा शुल्क लिया, होटल या सिनेमा ने कमाई की आदि। सब कुछ।
जीडीपी की गणना डॉलर से आंकी जाती है। इस हिसाब से अब दुनिया की टॉप 6 इकोनॉमी हैं :
इस हिसाब से ट्रिलियन डॉलर हुआ 93 लाख करोड़ रूपये के बराबर ! यानी भारत की इकोनॉमी करीब 400 लाख करोड़ से 450 लाख करोड़ के बीच है। साफ़ साफ़ है कि भारत यूके और जापान से मामूली पीछे है।
बाजीगरी यह है कि इस जीडीपी का प्रतिव्यक्ति आय से कोई सम्बन्ध नहीं है। भारत की आबादी है 148 करोड़, यूके की 7 करोड़ और जापान की 12 करोड़ 25 लाख। तो फिर इन तीनों की आय लगभग बराबर कैसे कही जा सकती है? मान लो एक घर में 15 लोग हैं, 10 लोग हर महीने एक एक हजार मिलाकर कुल 10 हजार कमाते हैं, दूसरे घर में दो लोग हैं जो दोनों 5 -5 हजार मिलाकर 10 हजार महीना कमाते हैं? तीसरे घर में तीन लोग हैं जो सभी चार चार हजार महीना मिलाकर 12 हजार कमाते हैं तो बताइये किस घर में सम्पन्नता ज्यादा हुई? जिस घर में 15 लोग हैं वहां या जिस घर में दो या तीन लोग हैं, वहां? एक बस्ती में सौ लोग रहते हैं जो सब मिलकर 100,000 कमाते हैं और पास के मकान में 2 लोग रहते हैं, जिनकी तनख्वाह 100,000 है। तो कौन ज्यादा मालदार हुआ?
भारत प्रतिव्यक्ति आय में दुनिया में बहुत नीचे है। भारत की प्रतिव्यक्ति आय यानी प्रति व्यक्ति जीडीपी बहुत ही कम है, क्योंकि हमारी आबादी बहुत ज्यादा है।, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में हम निचले मध्य स्तर के देशों में आते हैं। 190 देशों में भारत यहाँ 172 वें पायदान पर है। भारत में कमाई 2,813 डॉलर प्रति व्यक्ति, प्रतिवर्ष (लगभग ₹2.35 लाख रुपये) ही है जबकि यूके / जापान में 45,000–52,000 के आसपास (भारत से 16-18 गुना ज्यादा), चीन में करीब 13,000–15,000 डॉलर (भारत से 4-5 गुना ज्यादा) है। हम कहते हैं कि भारत में महंगाई कम है इसलिए इतनी कमाई को भी पर्याप्त कहा जा सकता है। वास्तव में ऐसा भी नहीं है। पर कैपिटा पर्चेसिंग पावर भारत मेंबहुत ज्यादा नहीं है। इसमें भी हम 119 में पायदान पर है यानी दुनिया में भारत से भी सस्ते देश हैं।
भारत की इकोनॉमी बहुत तेजी से बढ़ रही है यह दावा किया जाता है जो एक हद तक सही भी है लेकिन उतना भी सही नहीं, जितना कि सरकारी माध्यमों में कहा जाताहै। एक छोटे से उदाहरण से इस बात को समझा सकता है। एक कक्षा में ए बी सी डी नाम के चार विद्यार्थी पढ़ते हैं। छठी कक्षा में डी को 50% अंक आते हैं और ए को 90 % बी को 80% और सी को 70 % नंबर आते हैं। एक साल बाद सातवीं कक्षा के रिजल्ट में डी को 60 % नंबर मिले और ए को 99% , बी को 88% और सी को 77 % अंक मिलें, तो बताइये पढ़ाई में कौन अव्वल रहा?
डी अब पूरे मोहल्ले में कहता फिर रहा है कि भले मेरे मार्क्स तीनों से कम रहे हों, पर मेरी ग्रोथ सबसे बढ़िया रही। ए, बी और सी की ग्रोथ 7, 8 और 9 नंबर की ही रही, मैंने तो 50 से 60 नंबर पाए, पूरे 10 नंबर ज़्यादा ! डी यह भी कहा सकता है कि की ग्रोथ 10 प्रतिशत की रही, जबकि मैं 50 का 20 प्रतिशत यानी पूरे 10 नंबर ज्यादा लाकर ‘फास्टेस्ट ग्रोइंग’ स्टूडेंट रहा।
अच्छा तो नहीं लग रहा यह लिखते हुए कि भारत की स्थिति ‘डी’ जैसी ही है।
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