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रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (CGMSC) एक बार फिर बड़े भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता ने आरोप लगाया है कि 400 जरूरी दवाओं में से 184 दवाओं का अनुबंध एक ही ब्लैकलिस्टेड कंपनी को दे दिया गया। डॉ. गुप्ता ने स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि यूनिक्योर कंपनी अन्य राज्यों में ब्लैकलिस्टेड है और कंपनी ने खुद CGMSC को लिखित सूचना दी थी। इसके बावजूद कंपनी को ब्लैकलिस्ट नहीं किया गया। उन्होंने इसे ‘भ्रष्टाचार में मिलीभगत’ का सीधा प्रमाण बताया।
डॉ. राकेश गुप्ता ने ब्लैकलिस्टेड कंपनी सवाल उठाया है की CGMSC के उत्तराधिकारी द्वारा यह तर्क कि अलग-अलग राज्यों में ब्लैकलिस्टेड का कंपनी किए जाने का अलग-अलग नियम है तो यह प्रश्न उठता है कि सात राज्यों में ब्लैक लिस्टेड कंपनी छत्तीसगढ़ में पवित्र कैसे साबित हो गई जबकि आए दिन नकली दवाओं के बारे में सुर्खियां बनी हुई है, इसमें दवा कारपोरेशन के जनरल मैनेजर टेक्निकल की भूमिका भी संदेह में है जिन्हें भारी भ्रष्टाचार के के सबूत होने के बावजूद उसे पद पर नियुक्त किया गया है। इसके अलावा CGMSC के जनरल मैनेजर टेक्निकल की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि भ्रष्टाचार के सबूत होने के बावजूद उन्हें पद पर बनाए रखा गया है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉ राकेश गुप्ता ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन की निविदा प्रक्रिया में अयोग्यता के मापदंड निर्धारित हैं। इन बिंदुओं के अनुसार सीजी एमएससी में दवा सप्लाई करने वाली किसी भी कंपनी को अन्य राज्य में ब्लैक लिस्टेड या अयोग्य पाए जाने पर मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर को लिखित में सूचना देना अनिवार्य है इसकी सूचना यूनिक्योर कंपनी ने विधिवत रूप से सीजीएमएससी में दी है। सूचना मिल जाने के बाद कंपनी को ब्लैकलिस्टेड करने का प्रावधान है।
डॉ राकेश गुप्ता ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय या CBI जांच कराई जाए, ब्लैकलिस्टेड कंपनी का अनुबंध तुरंत रद्द किया जाए, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो,अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
कांग्रेस ने CGMSC में ‘फर्स्ट इन फर्स्ट आउट’ (FIFO) भुगतान व्यवस्था की भी आलोचना की है। आरोप है कि पुराने और ईमानदार सप्लायर्स का भुगतान रोके रखा जा रहा है, जबकि कुछ चुनिंदा रसूखदार कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे कई सप्लायर्स ने नई दवाएं भेजना बंद कर दिया है, जिससे सरकारी अस्पतालों में दर्द निवारक, एंटीबायोटिक और जीवनरक्षक दवाओं का संकट पैदा हो गया है।
इसके पहले RTI से मिली जानकारी के अनुसार CGMSC ने चालू वित्तीय वर्ष में बिना किसी बजटीय मंजूरी के 120 करोड़ रुपये की दवाएं, रिएजेंट और महंगे चिकित्सा उपकरण खरीदे। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय और वित्त विभाग की चेतावनियों को नजरअंदाज कर यह खरीद की गई। आरटीआई दस्तावेजों के मुताबिक, इसमें से 89 करोड़ रुपये दवाओं और लैब रिएजेंट पर खर्च हुए। सूत्रों का कहना है कि खरीदी गई दवाओं में से करीब 30 प्रतिशत दवाएं अभी भी निगम के गोदामों में धूल खा रही हैं, जबकि राज्य के जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं की भारी किल्लत है।
इस मामले में cgmsc के डायरेक्टर से द लेंस ने संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन संपर्क नहीं हो पाया।
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