प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नबीन की ताजपोशी के मौके पर कहा है कि संगठन के मामले में ‘नवीन मेरे बॉस हैं’! सुनने में यह अच्छा लगता है, लेकिन बीते 11-12 सालों में भाजपा का स्वरूप जिस तरह बदला है और पार्टी पर जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की पकड़ मजबूत हुई है, उसमें लगता नहीं कि नितिन नबीन मोदी-शाह की मर्जी के बिना कोई फैसला ले सकेंगे।
बेशक नितिन नबीन 45 साल के हैं और अपेक्षाकृत युवा हैं। उन्हें पार्टी की कमान सौंप कर युवाओं में संदेश देने की कोशिश की है। लेकिन उनका चयन जिस तरह से हुआ है, वह खुद को दूसरों से अलग बताने वाली भाजपा की दशा और दिशा को भी दिखा रहा है।
कांग्रेस और सपा, राजद या एनसीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के आंतरिक चुनावों को लेकर अक्सर हमलावर रहने वाली भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन का पदारोहण बहुत से सवाल भी खड़े करता है।
पिछले साल दिसंबर में जब भाजपा संसदीय बोर्ड ने बिहार की नीतीश सरकार में मंत्री रहे नितिन नबीन को भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया था, तभी साफ हो गया था कि उन्हें जल्द ही पार्टी की कमान सौंप दी जाएगी।
जाहिर है, कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन का चयन किसी चुनाव के जरिये नहीं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व की मर्जी से हुआ था। 19 जनवरी को अध्यक्ष पद के चुनाव में वह अकेले उम्मीदवार थे और प्रधानमंत्री मोदी से लेकर पार्टी के सारे प्रमुख नेता उनके प्रस्तावक समर्थक थे। ऐसे में पार्टी की ओर से किसी और उम्मीदवार का सामने नहीं आना हैरत में नहीं डालता।
वास्तव में कार्यकारी अध्यक्ष बनने से पहले नितिन नबीन की पहचान नीतीश सरकार में एक मंत्री और छत्तीसगढ़ के पार्टी प्रभारी तक ही सीमित थी। नितिन नबीन पार्टी के दूसरे क्रम के नेताओं में भी कहीं शुमार नहीं थे।
यही नहीं, भाजपा परिवारवाद को लेकर अक्सर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों पर हमलावर रहती है, लेकिन नितिन नबीन के दिवंगत पिता बिहार में कई बार विधायक रहे थे और उनके निधन के बाद ही उन्हें मौका दिया गया।
दरअसल नितिन नबीन की ताजपोशी को मोदी-शाह के युग में बदलती भाजपा के संदर्भ में देखना चाहिए। इसकी शुरुआत जून, 2013 में उसी समय हो गई थी, जब भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी के प्रचार अभियान का प्रमुख चुना था। इसके साथ ही अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था।
मई, 2014 में मोदी की अगुआई में भाजपा को लोकसभा में मिली जीत के बाद से पार्टी के हर फैसले मोदी-शाह की मर्जी के बिना नहीं होते, यह कोई अनजानी बात नहीं है। यह भाजपा के निवर्तमान अध्यक्ष जे पी नड्डा के कार्यकाल के दौरान देखा ही जा चुका है।
वास्तव में भाजपा को 2014 में मिली जीत के बाद जिस तरह से तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और उनकी जगह अमित शाह को पार्टी की कमान सौंपी गई, उसी दिन यह साफ हो गया था कि भाजपा की चाल और चेहरा कितना बदल चुका है और वह अटल-आडवाणी की पार्टी से कितनी दूर जा चुकी है।
यह बात किसी से छिपी है क्या कि चाहे लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा के चुनाव भाजपा के मुख्य रणनीतिकार अमित शाह ही होते हैं और चेहरा नरेंद्र मोदी। दरअसल नवीन को नरेंद्र मोदी का बॉस कहने के बजाए मोदी-शाह की टीम का एक विश्वसनीय सदस्य कहना शायद ज्यादा ठीक होगा।
वह ऐसे समय भाजपा के अध्यक्ष बने हैं, जब अगले कुछ महीनों में भाजपा शासित असम के साथ ही गैरभाजपा शासित पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं, जहां भाजपा कभी सत्ता में नहीं आ सकी है।
ऐसे में यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि नितिन नबीन मोदी-शाह की छाया से बाहर निकलकर क्या अपनी कोई पहचान बना पाते हैं।

